बुधवार, 21 मार्च 2012

"Jalaa so allaah"

"जला सो अल्लाह"
 का प्राक्कथन-अंश 
जलाराम बापा के प्रति अनुयायियों की आस्था और श्रद्धा को समय का चक्र भी प्रभावित नहीं कर सका है. इनके अनुयायी देश ही नहीं वरन पूरी दुनिया में हैं. व्यक्तिगत तौर पर मैं और मेरा परिवार भी जलाराम बापा के प्रति अगाध श्रद्धा और आस्था रखता है. जब भी मुझ पर कोई विपत्ति आयी है, तब जलाराम बापा को श्रद्धापूर्वक याद करने से राहत मिली है. जलाराम बापा की जन्म और कर्म भूमि वीरपुर गाँव में उनके मंदिर में भी मत्था टेकने से आत्मिक संतोष की अनुभूति होती है.  

मंगलवार, 20 मार्च 2012

"jalaa so allaah"- bhoomikaa-ansh

"जला सो अल्लाह" की भूमिका का अंश  
 जलाराम बापा का जन्म- संवत १८५६, कार्तिक शुक्ल सप्तमी, सोमवार, ता. ४-११-१७९९, यज्ञोपवीत - संवत १८७०, विवाह- संवत १८७२, प्रभु का पहला चमत्कार देखा- संवत १८७३, चारों धाम की यात्रा की- संवत १८७४, सदाव्रत प्रारम्भ किया- संवत १८७६, माघ शुक्ल २, सोमवार, ता. १७-१-१८२०, जलाराम बापा की पत्नी वीर बाई को प्रभु ने झोली-डंडा अर्पित किया- संवत १८८५, पत्नी वीर बाई का स्वर्गवास- संवत १९३५, कार्तिक कृष्ण ९, सोमवार, ता. १८-११-१८७८, जलाराम बापा का स्वर्गवास- संवत १९३७, माघ कृष्ण १०, बुधवार, ता. २३-२-१८८१.              

सोमवार, 19 मार्च 2012

My book "jalaa so allaah"

मेरी किताब "जला सो अल्लाह" का प्राक्कथन : "राम नाम में लीन हैं, देखत सबमें राम, ताके पद वंदन करूं, जय जय श्री जलाराम" यह पंक्ति संत शिरोमणि श्रद्धेय जलाराम बापा के जीवन-दर्शन को गागर में सागर के सदृश्य रूपायित करती है. गृहस्थ आश्रम में रह कर भी जलाराम बापा ने सांसारिक मोह माया से परे हट कर सेवा और भक्ति को अपने जीवन का मूलमंत्र बनाया था. अपनी सेवाभावी धर्मपत्नी वीर बाई के सहयोग से इन्होंने सदाव्रत-अन्नदान सेवा कार्य के जरिये सामाजिक जीवन का प्रेरणादायी मार्ग प्रशस्त किया था. जलाराम बापा ने दरिद्र नारायण की सेवा को ही वास्तविक प्रभु भक्ति मान कर अपना समस्त जीवन समर्पित कर दिया था. दीन दुखियों और भिक्षुओं की सेवा उनकी पहली प्राथमिकता में शुमार था. "खुद भूखे रह कर दूसरों का पेट भरना" जलाराम बापा का प्रमुख सिद्धांत था. घर आये अथितियों में उन्हें प्रभु श्रीराम की झलक मिलती थी. भिक्षु, साधु -सन्यासी, यात्री सहित सभी आगंतुक अथितियों को वे "रोटी में राम" के दर्शन करवाते थे. इनके आँगन में आया श्रद्धालु व्यक्ति सार्थक जीवन दर्शन आत्मसात कर लौटता था. जलाराम बापा अपनी प्रशंसा और निंदा से कभी भी आत्ममुग्ध अथवा विचलित नहीं होते थे. धर्म-आख्यान और प्रवचन करने के बजाय वे जरूरतमंदों की सेवा को ही अपना प्रमुख लक्ष्य और कर्तव्य समझते थे. समय-समय पर ईश्वर ने भी जलाराम बापा की गहन कसौटी ली, जिसमें वे पूरी तरह खरे उतरे. श्रद्धालु और अनुयायी जलाराम बापा को सेवक संत के रूप में ईश्वर का अवतार मानते. सच्चे मन से जलाराम बापा के स्मरण मात्र से लोगों के दुःख दर्द दूर हो जाते. इनके स्नेहमयी स्पर्श और आशीर्वाद से प्रत्येक जीव में नवजीवन का संचार हो जाता था. सहृदयपूर्वक जलाराम बापा के नाम से मानी गई मन्नत फलीभूत होने में कोई संदेह नहीं रहता. उनके चमत्कार जनहित के पर्याय रहे हैं. आज भी यही स्थिति यथावत है. जलाराम बापा के प्रति अनुयायियों की आस्था और श्रद्धा को समय का चक्र भी प्रभावित नहीं कर सका है. इनके अनुयायी देश ही नहीं वरन पूरी दुनिया में हैं.                     


शुक्रवार, 16 मार्च 2012

"Jalaa so allaah" .... thanks

"जला सो अल्लाह".... आभार 
मेरी पहली किताब "जला सो अल्लाह" (संत जलाराम बापा की जीवन-कथा) का लोकार्पण समारोह बिलासपुर में इस चैत्र नवरात्रि के दौरान आयोजित करना तय हुआ है. इसके पहले ही देश-विदेश से प्राप्त उत्साहंवर्धन प्रतिक्रियाओं और आप सभी प्रबुद्ध ब्लाग पाठकों द्वारा हौसला अफजाई किये जाने के लिए धन्यवाद. इस किताब के प्रकाशक "बापा पब्लिकेशन" का नाम और लोगो भी मेरे लिए सौभाग्यशाली रहा.  

गुरुवार, 15 मार्च 2012

jalaa so allaah

 
जला सो अल्लाह 
मेरी पहली किताब "जला सो अल्लाह" (संत जलाराम बापा की जीवन-कथा) छप कर आ गई है. इसके प्रकाशक बापा पब्लिकेशन, बिलासपुर हैं. इसका लोकार्पण समारोह बिलासपुर में इस चैत्र नवरात्रि के दरम्यान करने की योजना है. इस किताब में गुजरात के पूजनीय अवतारी संत जलाराम बापा के सेवा भावी जीवन पर आधारित चालीस प्रेरणादायी कथाएं हैं, जो जीने की नयी राह दिखाती हैं. ये सभी कथाएं सर्वप्रथम मैंने अपने ब्लॉग "बापा की बगिया" में लिखी, जो फेसबुक पर भी लिंक की हुई हैं. आप सभी मित्रों-पाठकों से मिले बेहतर प्रतिसाद से प्रेरित होकर मैंने इन कथाओं को किताब का स्वरुप दिया है.       

रविवार, 8 जनवरी 2012

Jalaram bapaa kee jeewan-kathaa ( 40 - antim )

स्वर्ग जाते समय रथ में निंदक को भी बैठने कहा : जलाराम बापा के देहावसान के बाद स्वर्ग जाते समय उनकी दूसरी और अंतिम मुलाक़ात अपने घोर निंदक टीलाराम के साथ हुई. दरअसल, जलाराम बापा अनुयायियों को जितना सम्मान देते थे, उतना ही अपने निंदकों को भी आदर देते थे. वे सभी व्यक्तियों में प्रभु का अंश देखते थे. सार्वजानिक तौर पर अथवा पीठ पीछे बुराई करने वालों को भी वे अपना आशीर्वाद देते थे. उनकी हरसंभव मदद भी करते थे. जलाराम बापा के गाँव वीरपुर में भी उनका एक घोर निंदक था टीलाराम. पेशे से वह किराना दुकानदार था. आर्थिक रूप से वह सक्षम था. कद में वह जरूर ठिगना था, लेकिन कुत्सित विचारों में उंचा था. जितना वह जमीन के ऊपर था, उतना जमीन के नीचे भी. दुकानदारी से जब वह निवृत्त हो जाता तो पैदल बाजार में निकल पड़ता अपने करीबी लोगों की बुराई करने. चहेरे का रंग गोरा था, किन्तु जुबान काली थी. खाली वक़्त में परनिंदा का सुख लेना उसका शगल बन गया था. जो उसकी मदद करता था या अपने साथ रखता था, उसे ही पहले वह अपना निशाना बनाता था. लोगों को अपमानित करने वह अक्सर अवसर की तलाश में रहता. हद तो तब हो जाती, जब टीलाराम जलाराम बापा को भी घेर लेता और फिर धरा का बोझ बताते हुए उन्हें संतुलन की सीख देता. उन्हें ढोंगी संत साबित करने में अपनी ऊर्जा नष्ट करता. लेकिन उदारमना जलाराम बापा उसकी अपमानजनक बातों और निंदा युक्त बर्ताव का बिलकुल बुरा नहीं मानते थे. वे उसकी बातों को मुस्कुरा कर अनसुना कर देते थे. जिससे खीजवश टीलाराम पागलों की तरह बडबडाते हुए उनके पीछे पीछे घर तक पहुँच जाता. फिर भी जलाराम बापा उसे सम्मान के साथ अपने घर में बैठाते और उसका आथित्य सत्कार करते.
जलाराम बापा जब गंभीर रूप से बीमार हुए, तब टीलाराम भी तबियत की पूछपरख के बहाने उनके घर पहुँच गया. अकेले जाने का साहस नहीं हो रहा था, तो उसने अपने एक रिश्तेदार को भी साथ रख लिया. सभी अनुयायी क्रमवार जलाराम बापा के चरण स्पर्श कर उनसे आशीर्वाद ले रहे थे. टीलाराम किनारे चुपचाप बैठ कर जलाराम बापा के मनोभाव को भांपने की कोशिश कर रहा था. उस पर जब जलाराम बापा की नजर पडी तो उन्होंने उसे इशारे से अपने पास बुलाया और पूछा- "कैसे हो टीलाराम भाई, मजे में हो न?". टीलाराम अपनी पुरानी हरकत से बाज नहीं आया. खुरापात उसके रग रग में थी. उसने व्यंगात्मक लहजे कहा- "बापा, अपनी तो हमेशा मौज रहती
है. आप अपना ध्यान रखो. अब आपकी उम्र बहुत हो गई है, पता नहीं कब आपका राम नाम सत्य हो जाय. खैर,
आपको क्या चिंता है. आपके लिए तो स्वर्ग में जगह निर्धारित है". जलाराम बापा ने मुस्कुराते हुए प्रत्युत्तर दिया- "टीलाराम भाई, तुम्हारा अनुमान सही है, न जाने किस घड़ी में प्रभु श्रीराम का बुलावा आ जाय. वास्तव में प्रभु श्रीराम का नाम सत्य का पर्याय है. किन्तु स्वर्ग में मेरी जगह निर्धारित है या नहीं, यह तो मेरे प्रभु ही जानते हैं".
अनावश्यक बहस और कुतर्क करना टीलाराम के स्वभाव में शामिल था, इसलिए उसने व्यंग बाण छोड़ते हुए कहा- "क्यों बापा आप तो बेरोजगार होते हुए भी रोज भूखे और फटीचरों का पेट भरते हैं, दिन में दस बार भगवान को पूजते हैं, यह क्या कम है. फिर आपको स्वर्ग में जगह क्यों नहीं मिलेगी?". जलाराम बापा ने उसकी व्यंग भरी
जिज्ञासा को शांत करते हुए कहा- "टीलाराम भाई तुम ठहरे पक्के चंट व्यापारी. कर्म के बाद फल की चिंता करना
तुम्हारा धर्म है, किन्तु मैं  प्रभु और दीनदुखियों का निर्धन सेवक हूँ, मेरा धर्म मात्र कर्म करना है, फल की चिंता करना नहीं". टीलाराम तो तय करके आया था आज जलाराम बापा को ठीक करना है. उसने चुटकी लेते हुए कहा- "बापा, मैंने सुना है आपको लेने स्वर्ग से हवाई रथ आने वाला है?" जलाराम बापा हँसे और फिर पूछा- "क्यों तुझे मेरे साथ चलना है क्या?" टीलाराम बोला- "हाँ, बापा आपके सिवाय मुझे और कौन स्वर्ग के हवाई रथ में बैठा कर ले जाएगा. मुझे उस दिन का बेसब्री से इन्तजार रहेगा". जलाराम बापा ने यह कह कर बातचीत ख़त्म करनी चाही- "ठीक है टीलाराम भाई, स्वर्ग से जब हवाई रथ मुझे लेने आयेगा तो तुझे भी अपने साथ लेता जाउंगा".
टीलाराम की व्यंगात्मक लहजे वाली बातों को आसपास खड़े स्थानीय अनुयायी भी सुन रहे थे. हालांकि वे उसके
स्वभाव से परिचित थे, लेकिन टीलाराम द्वारा मौके की नजाकत को न समझने के कारण अनुयायी उस पर नाराज हो गए. जलाराम बापा ने सबको शांत रहने का इशारा किया. बात न बढे, इसलिए एक बुजुर्ग अनुयायी टीलाराम का हाथ पकड़ कर उसे बाहर ले गए और उसे विदा किया.
महा वदी नवमीं, मंगलवार की देर रात को टीलाराम जल्दी से नित्य कर्म से निवृत्त हुआ और जेतपुर जाने के लिए निकल पडा. वीरपुर गाँव से जेतपुर की दूरी आठ मील थी. वह जेतपुर से ही सामान लाकर बेचा करता था. वह दसमी, बुधवार की सुबह ही जेतपुर पहुँच गया. शीघ्रता से वह जरूरत का सामान खरीद कर वापस वीरपुर गाँव के लिए रवाना हो गया. वीरपुर गाँव पहुँचने के लिए अभी उसे तीन मील और चलना बाकी था, तभी उसे सामने से एक सुसज्जित रथ आता दिखाई दिया. टीलाराम सोचने लगा जरूर यह रथ किसी राजा महाराजा का होगा. अचंभित होकर वह आते हुए रथ को देखने लगा. अगले ही पल वह रथ उसके पास आकर रूक गया. गौर
से देखा तो उसकी आँखें चौंधिया गई. उसमें कोई और नहीं बल्कि स्वयं जलाराम बापा बैठे हुए थे. जलाराम बापा
को बैठा देख कर उसकी खुरापात जागृत हो गई. टीलाराम ने व्यंग कसा- "क्या बापा, किसी राजा का बुलावा आया है क्या?'. जलाराम बापा बोले- "हाँ टीलाराम भाई". उसने कहा- "आप ही की ऐश है. वैसे बताओ तो सही किस राजा के मेहमान बन कर जा रहे हो, किसने भेजा है यह रथ".जलाराम बापा ने अर्थपूर्ण मुस्कान के साथ संक्षिप्त प्रत्युत्तर दिया- "श्रीराम ने". वह मजाक उड़ाते हुए बोला- "इसका मतलब यह राजा का रथ नहीं बल्कि स्वर्ग का रथ है".जलाराम बापा ने कहा- "टीलाराम भाई, मैंने तुझसे वादा किया था स्वर्ग से जब हवाई रथ मुझे लेने आयेगा तो तुझे भी अपने साथ लेता जाउंगा, अब वह क्षण आ गया है, यह सब सामान छोड़ और बैठ मेरे साथ, हम स्वर्ग साथ चलेंगे". स्वर्ग का नाम सुनते ही टीलाराम की सिट्टी पिट्टी गम हो गई, उसकी हालत पतली हो गई, पसीने से वह तरबतर हो गया, भय से उसका पायजामा भी गिला हो गया. जलाराम बापा हंसते हुए
बोले- "चल जल्दी बैठ टीलाराम भाई , स्वर्ग जाने में देर हो रही है". उसने कन्नी काटते हुए कहा- "बापा, आपको ही मुबारक हो स्वर्ग, मुझे नहीं चलना है आपके साथ, मैं यहीं खुश हूँ". जलाराम बापा बोले- "फिर ये न कहना बापा रथ में बैठ कर अकेले स्वर्ग चले गए, और मुझे पूछा तक नहीं". टीलाराम ने टरकाने के अंदाज में जवाब दिया- "बापा, जल्दी निकल लो, आपको देर हो जायेगी. ऐसा होता है क्या स्वर्ग का रथ?" जलाराम बापा ने शांत भाव से कहा- "ठीक है, जैसी तुम्हारी इच्छा, राम-राम". फिर अगले ही पल जलाराम बापा का स्वर्ग रथ टीलाराम की नज़रों से ओझल हो गया.
टीलाराम बडबडाते हुए आखिरकार वीरपुर गाँव पहुँच गया और फिर दुकानदारी में व्यस्त हो गया. उधर, ग्रामवासी शमशान से लौट रहे थे. उन्हें देख कर टीलाराम सड़क पर आया और एक ग्रामीण से पूछा- "क्या भाई, किसका राम नाम सत्य हो गया है?". उसने भी आश्चर्य से पूछा- "अरे टीलाराम, तुझे नहीं मालूम पड़ा क्या, जलाराम बापा स्वर्ग सिधार गए हैं". यह सुनते ही टीलाराम सन्न रह गया. उसके ज्ञान-चक्षु खुल गए. उसे अपनी
गंभीर गलती समझ में आ गई. स्वर्ग जाने का सुनहरा अवसर उसने अज्ञानतावश गवां दिया. उसे बेहद पछतावा
होने लगा. वह अपना सर पटक पटक कर रोने लगा. यह अप्रत्याशित दृश्य देख कर लोग इकट्ठे हो गए. उन्हें ताज्जुब हुआ टीलाराम तो जलाराम बापा का घोर निंदक है, फिर क्यों वह उनके स्वर्गवासी होने पर दहाड़ मार मार रो रहा है. जब उससे बुजुर्ग अनुयायी ने रोने का कारण पूछा तो टीलाराम ने बताया- "भाई, मैं अपने दुर्भाग्य
पर रो रहा हूँ. मेरे कर्म ख़राब है इसीलिये मैंने जलाराम बापा के आग्रह को ठुकरा कर स्वर्ग जाने का अमूल्य अवसर खो दिया.मेरी मति भ्रष्ट हो गई थी". यह सुन कर सभी लोग अचंभित रह गए. जलाराम बापा के प्रति लोगों की श्रद्धा और अधिक बढ़ गई. उधर, घोर निंदक टीलाराम का भी ह्रदय परिवर्तन हो गया. वह अब दिन रात
जलाराम बापा के गुणगान करने लगा था. बापा के आदर्शों को अपना कर वह दीनदुखियों की सेवा में जुट गया. जलाराम बापा की स्मृतियाँ और उनके जीवन-आदर्श सेवा कार्यों के लिए प्रेरणा के स्त्रोत बन गए. (इतिश्री) ,   (लेखक- दिनेश ठक्कर "बापा"), (जलाराम बापा के प्रचलित किस्से और किवदंतियों पर आधारित)                                    .                                                                  .                          

Jalaram bapaa kee jeewan-kathaa ( 39 )

मृत्यु के बाद मुंह बोली बहन से मुलाक़ात : जलाराम बापा अपनी नश्वर देह को त्याग कर स्वर्गवासी हो चुके थे. उनकी काया की अंतिम यात्रा प्रारम्भ हो गई थी. लेकिन स्वर्ग लोक की ओर जाते जाते भी जलाराम बापा की दो मुलाकातें इस मायावी धरा पर शेष थीं, जो बाद में वीरपुर वासियों के संज्ञान में आयीं भी.
हुआ यूं, जलाराम बापा तीन भाइयों में मंझले थे, लेकिन उनकी कोई बहन नहीं थी. इसलिए उन्होंने अपने गाँव वीरपुर की निवासी गलाल बाई को अपनी मुंह बोली बहन बनाया था. वह जलाराम बापा को स्नेह से जला भाई के नाम से संबोधित करती थीं. रक्षाबंधन के दिन वे जलाराम बापा को राखी बांधना नहीं भूलती थीं. रक्षा सूत्र बाँध कर वे जलाराम बापा को लम्बी उम्र देने प्रभु से कामना करती थीं. हर प्रसंग पर वे मौजूद रहती थीं. दोनों के बीच सगे भाई-बहन से भी ज्यादा स्नेह था. जब जलाराम बापा रोगग्रस्त होकर सदा के लिए बिस्तर पर ही लेटने को विवश हो गए थे, तब गलाल बाई जलाराम बापा का कुशलक्षेम जानने उनके पास नम आँखों के साथ आयीं. बिस्तर के निकट आते ही उन्होंने रोते हुए जलाराम बापा से पूछा- "जला भाई, तबियत कैसी है?'. जलाराम बापा शांत भाव से बोले- "गलाल बेन, इस नश्वर देह की सजा स्वीकार करनी पड़ती ही है. यह तो विधि का विधान है. तुम अपना हालचाल बताओ, कैसी हो?". वह रूआंसी होकर बोली- "जला भाई, मैं तो ठीक हूँ, किन्तु आपका इस तरह गंभीर रूप से बीमार होकर बिस्तर का साथी बन जाना समझ में नहीं आ रहा है. आपके आशीर्वाद से भक्तों का बड़े से बड़ा रोग पल भर में समाप्त हो जाता है, तो फिर आपको रोग इस तरह क्यों सता रहा है?". जलाराम बापा ने संक्षिप्त जवाब दिया- "यह भी प्रभु की इच्छा है, अपनी कोई बात हो तो बताओ". उन्होंने हाथ जोड़ कर कहा- "जला भाई, आपकी तबियत देख कर कहीं जाने का मन नहीं कर रहा है. किन्तु उमरावी गाँव से मेरे भाई रूपा ने सेवक भेज कर मुझे बुलवाया है. अगर आपकी आज्ञा हो तो आज एक दिन के लिए चली जाऊं". जलाराम बापा ने अनुमति देते हुए कहा- "ठीक है गलाल बेन, जाओ, भाई ने इतने स्नेह से बुलाया है तो तुमको जाना ही चाहिए. किन्तु वहां एक दिन से अधिक नहीं रूकना, मेरा कोई ठिकाना नहीं है". तत्पश्चात गलाल बाई तुरंत अपने भाई रूपा के गाँव जाने के लिए रवाना हो गई. रूपा भाई के घर पहुंचने पर गलाल बाई का आत्मीय स्वागत हुआ. कई दिनों बाद बहन घर आई थी, इसलिए रूपा भाई बेहद खुश हुए, लेकिन उनकी बहन का पूरा ध्यान वीरपुर में लगा हुआ था, जलाराम बापा की याद उन्हें रह रह कर आ रही थी. दूसरे दिन सुबह होते ही उन्होंने रूपा भाई से वीरपुर लौटने की इजाजत माँगी. उन्होंने कहा- "भाई, मुझे अभी वीरपुर वापस जाना है. जला भाई की तबियत बहुत खराब है, इसलिए मैं यहाँ अब अधिक नहीं रूक सकती". रूपा भाई ने जिद करते हुए कहा- "बहन, इतने दिनों बाद भाई के घर आई हो. एक दिन में ही वापस लौटने की बात कर रही हो. एक दो दिन और रूक जाओ". भाई की जिद के आगे गलाल बाई को मजबूर होकर झुकना पडा. वे उस रात रूक गई.
तीसरे दिन गलाल बाई वीरपुर के लिए प्रस्थान की. शाम के करीब चार बज रहे थे. अभी भी वीरपुर दो मील दूर था. एकाएक सामने से जलाराम बापा आते हुए गलाल बाई को दिखे. वह चौंक गयीं. गलाल बाई ने देखा जलाराम बापा के हाथ में पानी की मटकी थी. गलाल बाई प्रसन्न हो गई. वह उनके पास जाकर बोली- "अरे जला भाई, आप
इस समय यहाँ?, इतनी तेज धूप में कहाँ जा रहे हैं?" जलाराम बापा ने खुलासा किया- "गलाल बेन, बिस्तर पर सोने के समय मुझे तुम्हारा ख्याल आया. तुम इतनी धूप में आ रही हो तो प्यासी होगी, इसलिए तुम्हारे लिए मटकी में ठंडा पानी लेकर आया हूँ". गलाल बाई ने गदगद होकर कहा- "भाई हो तो ऐसा, आप कितना ध्यान रखते हैं अपनी बहन का". फिर उन्होंने ठंडा पानी पीकर अपना गला तर किया. जहां जलाराम बापा गलाल बाई को पानी पिला रहे थे, वहां बाजू के खेत में उस समय कचरा भाई डोबरिया किसानी कार्य में व्यस्त थे. जलाराम बापा ने उन्हें देख कर जोर से पुकारा- "कचरा भाई, क्या कर रहे हो". जलाराम बापा की आवाज सुन कर कचरा भाई दौड़ कर आ गए और जवाब दिया- "बापा, खेत से ही हमारी रोजी रोटी चलती है. किसानी का काम तो करना ही पडेगा न, नहीं तो बाल बच्चे भूखे मरेंगे". जलाराम बापा ने हंसते हुए कहा- "ठीक बोल रहे हो कचरा भाई, अपना काम ही अपनी पूजा है. अब वीरपुर गाँव चलो, गलाल बेन को तुम्हारा साथ भी मिल जाएगा". कचरा भाई जलाराम बापा के आदेश को सम्मान देते हुए वीरपुर गाँव चलने के लिए तुरंत राजी हो गए. फिर जलाराम बापा
ने गलाल बाई से कहा- "गलाल बेन, सूर्यास्त होने वाला है, मेरे यहाँ साधुसंत आ गए होंगे, मुझे शीघ्र पहुँचना होगा, तुम दोनों आराम से पहुँचो". गलाल बाई ने जवाब दिया- जला भाई, ठीक है. जैसा आपका आदेश". तत्पश्चात जलाराम बापा तेज कदमों से आगे बढ़ गए. अगले ही क्षण वे नज़रों से ओझल हो गए.
उधर, गलाल बाई और कचरा भाई आहिस्ते आहिस्ते चलते हुए वीरपुर गाँव की सीमा में प्रवेश कर गए. सड़क से सटे शमशान की तरफ दोनों की दृष्टि गई तो देखा वहां कई लोग बैठे हैं और सामने चिता जल रही है. उत्सुकतावश दोनों वहां पहुंचे. गलाल बाई ने एक परिचित से पूछा- "भाई, किसका देहावसान हो गया है?". उसने
रूंधे गले से जवाब दिया- "अरे गलाल बेन, ताजुब्ब है आपको नहीं मालूम, आपके और पूरे गाँव के जलाराम बापा
प्रभु श्रीराम को प्यारे हो गए हैं, वे हमें अनाथ बना कर इस दुनिया से चले गए हैं". यह सुन कर गलाल बाई के पैरों तले जमीन खिसक गई. वह भौंचक रह गई, इस अशुभ समाचार पर उन्हें भरोसा नहीं हो रहा था. उन्होंने आश्चर्य प्रकट करते हुए कहा- "क्या बोल रहे हो, ऐसा कैसे हो सकता है, अभी कुछ देर पहले ही जला भाई से मेरी भेंट हुई,  उन्होंने मुझे ठंडा पानी भी पिलाया". इतने में दूसरा परिचित बोला- "गलाल बेन, अंतिम सांस लेने से पहले बापा
आपको बहुत याद कर रहे थे. आप तो मात्र एक दिन के लिए भाई के गाँव गई थीं, फिर आने में देर क्यों कर दीं ?". गलाल बेन रोने लगी. रोते रोते वह अपने सर पर हाथ रख कर जमीन पर बैठ गई. वह निरूत्तर हो गई. लोगों ने उसे सांत्वना देकर शांत कराया. कुछ देर बाद वे जलाराम बापा की चिता के निकट गई और परिक्रमा करने के बाद हाथ जोड़ कर कहा- "जला भाई, आपके आदेश की मैंने अवहेलना की, मुझे क्षमा कर दीजिये". यह कह कर वे फिर फूट फूट कर रोने लगीं. अग्नि संस्कार संपन्न होने के बाद सभी अपने अपने घर चले गए. स्नान आदि शुद्धिकरण के पश्चात सभी ग्रामवासी रात को जलाराम बापा द्वारा बनवाए गए मंदिर परिसर में भजन कीर्तन के लिए एकत्रित हुए. गलाल बाई और कचरा भाई भी आये. गलाल बाई ने जलाराम बापा से मुलाक़ात का पूरा वृत्तांत फिर सुनाया तो किसी को विश्वास नहीं हुआ. सबने उसे मन का वहम बताया. तब कचरा भाई ने गलाल बाई की
बात का समर्थन किया और खुद के साक्षी होने का भरोसा दिलाया. तब फिर ग्रामवासियों को गलाल बाई की बात
सत्य लगी. सबने इस घटनाक्रम को जलाराम बापा का ही चमत्कार निरूपित किया. सभी ने जलाराम बापा के जयकारे लगाए तत्पश्चात राम धुन प्रारम्भ की गई. ( जारी )