शुक्रवार, 30 नवंबर 2012

मेरी पहली प्रकाशित किताब "जला सो अल्लाह"
(संत जलाराम बापा की जीवन-कथा) का मुख पृष्ठ  

शनिवार, 31 मार्च 2012

मेरी पहली किताब "जला सो अल्लाह" का लोकार्पण समारोह संपन्न

मेरी पहली किताब "जला सो अल्लाह" (संत जलाराम बापा की जीवन-कथा) का लोकार्पण समारोह रविवार, २५ अप्रैल २०१२ को बिलासपुर प्रेस क्लब में सादगी के साथ संपन्न हुआ.इस समारोह के मुख्य अतिथि वरिष्ठ पत्रकार-साहित्यकार श्री सतीश जायसवाल, विशिष्ट अतिथि दैनिक हरिभूमि के समाचार सम्पादक श्री ज्ञान अवस्थी, दैनिक भास्कर के वरिष्ठ उप सम्पादक श्री यशवंत गोहिल और प्रेस क्लब के उपाध्यक्ष श्री कमलेश शर्मा थे.समारोह की अध्यक्षता पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष श्री सोमनाथ यादव ने की.समारोह का ओजस्वी संचालन दूरदर्शन और आज तक टीवी न्यूज चेनल के संवाददाता श्री कमल दुबे ने किया. धन्यवाद ज्ञापित न्यूज एजेंसी पी.टी.आई. के संवाददाता श्री राजेश दुआ ने किया.                

किताब "जला सो अल्लाह" के लोकार्पण समारोह का ग्रैंड न्यूज वीडियो


किताब "जला सो अल्लाह" के लोकार्पण समारोह का न्यूज वीडियो


मंगलवार, 27 मार्च 2012

"जला सो अल्लाह" के लोकार्पण का समाचार दैनिक देशबंधु में प्रकाशित

किताब "जला सो अल्लाह" के लोकार्पण का समाचार २६ मार्च को दैनिक देशबंधु के बिलासपुर संस्करण में प्रकाशित हुआ. 

"जला सो अल्लाह" के लोकार्पण का समाचार दैनिक भास्कर में प्रकाशित

मेरी पहली किताब "जला सो अल्लाह" के लोकार्पण का समाचार दैनिक भास्कर के बिलासपुर संस्करण में २६ मार्च को प्रकाशित हुआ. 

किताब "जला सो अल्लाह" के लोकार्पण का समाचार

मेरी पहली किताब "जला सो अल्लाह" का लोकार्पण समारोह रविवार, २५ मार्च को दोपहर दो बजे बिलासपुर प्रेस क्लब में संपन्न हुआ. इसका विस्तृत समाचार २६ मार्च को दैनिक हरिभूमि के बिलासपुर संस्करण में प्रकाशित हुआ.   

सोमवार, 26 मार्च 2012

"Jalaa so allaah" kaa lokaarpan

बिलासपुर प्रेस क्लब में "जला सो  
अल्लाह" का लोकार्पण संपन्न 
बिलासपुर. "हिन्दी साहित्य में संत परम्परा और उनकी जीवनी पर केन्द्रित साहित्य का इस दौर में अभाव बना हुआ है. दिनेश ठक्कर लिखित संत जलाराम बापा पर पुस्तक "जला सो अल्लाह" (सन्त जलाराम बापा की जीवन-कथा) इस कमी को पूरी करती हुई एक कृति है". उक्त वक्तव्य रविवार, २५ मार्च को दोपहर दो बजे बिलासपुर प्रेस क्लब में वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार श्री सतीश जायसवाल ने "जला सो अल्लाह" के लोकार्पण समारोह के दौरान मुख्य अथिति की आसंदी से व्यक्त किये. श्री जायसवाल ने आगे कहा "श्री दिनेश ठक्कर ने चार दशकों की पत्रकारिता के बाद साहित्य के क्षेत्र में कदम रखा है". लोकार्पण समारोह की अध्यक्षता करते हुए पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष श्री सोमनाथ यादव ने इस अवसर पर कहा "संतों की जीवनी का व्यक्ति के मानस पर गहरा असर पड़ता है. उन्होंने स्वयं सौराष्ट्र की यात्रा के दौरान संत जलाराम बापा की जन्म और कर्म स्थली वीरपुर में जाकर दर्शन लाभ लिया है". समारोह में दैनिक भास्कर के उप सम्पादक श्री यशवंत गोहिल ने संत जलाराम की सेवा भावना का उल्लेख करते हुए कहा "उनका दाम्पत्य जीवन दीन दुखियों की की सेवा में सदैव समर्पित था. बापा संत महात्माओं की सेवा में सदैव आगे रहते थे". उन्होंने जलाराम बापा द्वारा भगवान् श्री राम स्वरुप एक महात्मा को अपनी धर्म पत्नी वीर बाई के दान का प्रसंग भी उल्लेखित किया. वरिष्ठ पत्रकार और प्रेस क्लब के पूर्व अध्यक्ष श्री ज्ञान अवस्थी ने भी कहा "संत साहित्य का प्रकाशन समाज को एक नयी दिशा देता है. श्री ठक्कर की कृति इसका एक जीवंत उदाहरण है.' इसके पहले बापा पब्लिकेशन से प्रकाशित श्री ठक्कर की पहली पुस्तक "जला सो अल्लाह" का विधिवत लोकार्पण श्री सतीश जायसवाल के करकमलों से हुआ. श्री ठक्कर ने स्वयं अपनी पुस्तक के प्रमुख अंशों का पठन किया. श्री ठक्कर ने जलाराम बापा के जीवन दर्शन की व्याख्या करते हुए कहा "बापा ने दरिद्र नारायण की सेवा को ही प्रभु भक्ति माना और अपना सम्पूर्ण जीवन इसी सेवा भावना को समर्पित कर दिया. खुद भूखे रहकर दूसरों का पेट भरना उनका प्रमुख सिद्धांत था. वे रोटी में राम के दर्शन करवाते थे". लोकार्पण समारोह में प्रेस क्लब के वरिष्ठ उपाध्यक्ष कमलेश शर्मा, निर्मल मानिक, सुब्रत पाल, राजीव दुआ, मनोज राय, रितेश शर्मा, सुनील शर्मा, दिलीप जगवानी, श्रीचंद मखीजा, मनोज सिंह ठाकुर, मोहन सोनी, पवन सोनी, जितेन्द्र रात्रे, जितेन्द्र ठाकुर, द्विवेंदु सरकार सहित समाचार पत्र और साहित्य जगत के अनेक लोग उपस्थित थे. समारोह का ओजस्वी संचालन वरिष्ठ पत्रकार कमल दुबे और आभार प्रदर्शन राजेश दुआ ने किया.                   

गुरुवार, 22 मार्च 2012

"Jalaa so allaah"

मेरी पहली किताब "जला सो अल्लाह" (संत जलाराम बापा की जीवन-कथा) का लोकार्पण चैत्र नवरात्रि के दौरान होना है. इस किताब को मैंने अपनी मातुश्री स्व. श्रीमती सरस्वती बेन और पिताश्री स्व. श्री केशवलाल ठक्कर को समर्पित किया है. आप सभी शुभचिन्तक मित्रों के उत्साहवर्धन स्वरुप यह किताब बापा पब्लिकेशन, बिलासपुर से प्रकाशित हुई है.    

बुधवार, 21 मार्च 2012

"Jalaa so allaah"

"जला सो अल्लाह"
 का प्राक्कथन-अंश 
जलाराम बापा के प्रति अनुयायियों की आस्था और श्रद्धा को समय का चक्र भी प्रभावित नहीं कर सका है. इनके अनुयायी देश ही नहीं वरन पूरी दुनिया में हैं. व्यक्तिगत तौर पर मैं और मेरा परिवार भी जलाराम बापा के प्रति अगाध श्रद्धा और आस्था रखता है. जब भी मुझ पर कोई विपत्ति आयी है, तब जलाराम बापा को श्रद्धापूर्वक याद करने से राहत मिली है. जलाराम बापा की जन्म और कर्म भूमि वीरपुर गाँव में उनके मंदिर में भी मत्था टेकने से आत्मिक संतोष की अनुभूति होती है.  

मंगलवार, 20 मार्च 2012

"jalaa so allaah"- bhoomikaa-ansh

"जला सो अल्लाह" की भूमिका का अंश  
 जलाराम बापा का जन्म- संवत १८५६, कार्तिक शुक्ल सप्तमी, सोमवार, ता. ४-११-१७९९, यज्ञोपवीत - संवत १८७०, विवाह- संवत १८७२, प्रभु का पहला चमत्कार देखा- संवत १८७३, चारों धाम की यात्रा की- संवत १८७४, सदाव्रत प्रारम्भ किया- संवत १८७६, माघ शुक्ल २, सोमवार, ता. १७-१-१८२०, जलाराम बापा की पत्नी वीर बाई को प्रभु ने झोली-डंडा अर्पित किया- संवत १८८५, पत्नी वीर बाई का स्वर्गवास- संवत १९३५, कार्तिक कृष्ण ९, सोमवार, ता. १८-११-१८७८, जलाराम बापा का स्वर्गवास- संवत १९३७, माघ कृष्ण १०, बुधवार, ता. २३-२-१८८१.              

सोमवार, 19 मार्च 2012

My book "jalaa so allaah"

मेरी किताब "जला सो अल्लाह" का प्राक्कथन : "राम नाम में लीन हैं, देखत सबमें राम, ताके पद वंदन करूं, जय जय श्री जलाराम" यह पंक्ति संत शिरोमणि श्रद्धेय जलाराम बापा के जीवन-दर्शन को गागर में सागर के सदृश्य रूपायित करती है. गृहस्थ आश्रम में रह कर भी जलाराम बापा ने सांसारिक मोह माया से परे हट कर सेवा और भक्ति को अपने जीवन का मूलमंत्र बनाया था. अपनी सेवाभावी धर्मपत्नी वीर बाई के सहयोग से इन्होंने सदाव्रत-अन्नदान सेवा कार्य के जरिये सामाजिक जीवन का प्रेरणादायी मार्ग प्रशस्त किया था. जलाराम बापा ने दरिद्र नारायण की सेवा को ही वास्तविक प्रभु भक्ति मान कर अपना समस्त जीवन समर्पित कर दिया था. दीन दुखियों और भिक्षुओं की सेवा उनकी पहली प्राथमिकता में शुमार था. "खुद भूखे रह कर दूसरों का पेट भरना" जलाराम बापा का प्रमुख सिद्धांत था. घर आये अथितियों में उन्हें प्रभु श्रीराम की झलक मिलती थी. भिक्षु, साधु -सन्यासी, यात्री सहित सभी आगंतुक अथितियों को वे "रोटी में राम" के दर्शन करवाते थे. इनके आँगन में आया श्रद्धालु व्यक्ति सार्थक जीवन दर्शन आत्मसात कर लौटता था. जलाराम बापा अपनी प्रशंसा और निंदा से कभी भी आत्ममुग्ध अथवा विचलित नहीं होते थे. धर्म-आख्यान और प्रवचन करने के बजाय वे जरूरतमंदों की सेवा को ही अपना प्रमुख लक्ष्य और कर्तव्य समझते थे. समय-समय पर ईश्वर ने भी जलाराम बापा की गहन कसौटी ली, जिसमें वे पूरी तरह खरे उतरे. श्रद्धालु और अनुयायी जलाराम बापा को सेवक संत के रूप में ईश्वर का अवतार मानते. सच्चे मन से जलाराम बापा के स्मरण मात्र से लोगों के दुःख दर्द दूर हो जाते. इनके स्नेहमयी स्पर्श और आशीर्वाद से प्रत्येक जीव में नवजीवन का संचार हो जाता था. सहृदयपूर्वक जलाराम बापा के नाम से मानी गई मन्नत फलीभूत होने में कोई संदेह नहीं रहता. उनके चमत्कार जनहित के पर्याय रहे हैं. आज भी यही स्थिति यथावत है. जलाराम बापा के प्रति अनुयायियों की आस्था और श्रद्धा को समय का चक्र भी प्रभावित नहीं कर सका है. इनके अनुयायी देश ही नहीं वरन पूरी दुनिया में हैं.                     


शुक्रवार, 16 मार्च 2012

"Jalaa so allaah" .... thanks

"जला सो अल्लाह".... आभार 
मेरी पहली किताब "जला सो अल्लाह" (संत जलाराम बापा की जीवन-कथा) का लोकार्पण समारोह बिलासपुर में इस चैत्र नवरात्रि के दौरान आयोजित करना तय हुआ है. इसके पहले ही देश-विदेश से प्राप्त उत्साहंवर्धन प्रतिक्रियाओं और आप सभी प्रबुद्ध ब्लाग पाठकों द्वारा हौसला अफजाई किये जाने के लिए धन्यवाद. इस किताब के प्रकाशक "बापा पब्लिकेशन" का नाम और लोगो भी मेरे लिए सौभाग्यशाली रहा.  

गुरुवार, 15 मार्च 2012

jalaa so allaah

 
जला सो अल्लाह 
मेरी पहली किताब "जला सो अल्लाह" (संत जलाराम बापा की जीवन-कथा) छप कर आ गई है. इसके प्रकाशक बापा पब्लिकेशन, बिलासपुर हैं. इसका लोकार्पण समारोह बिलासपुर में इस चैत्र नवरात्रि के दरम्यान करने की योजना है. इस किताब में गुजरात के पूजनीय अवतारी संत जलाराम बापा के सेवा भावी जीवन पर आधारित चालीस प्रेरणादायी कथाएं हैं, जो जीने की नयी राह दिखाती हैं. ये सभी कथाएं सर्वप्रथम मैंने अपने ब्लॉग "बापा की बगिया" में लिखी, जो फेसबुक पर भी लिंक की हुई हैं. आप सभी मित्रों-पाठकों से मिले बेहतर प्रतिसाद से प्रेरित होकर मैंने इन कथाओं को किताब का स्वरुप दिया है.       

रविवार, 8 जनवरी 2012

Jalaram bapaa kee jeewan-kathaa ( 40 - antim )

स्वर्ग जाते समय रथ में निंदक को भी बैठने कहा : जलाराम बापा के देहावसान के बाद स्वर्ग जाते समय उनकी दूसरी और अंतिम मुलाक़ात अपने घोर निंदक टीलाराम के साथ हुई. दरअसल, जलाराम बापा अनुयायियों को जितना सम्मान देते थे, उतना ही अपने निंदकों को भी आदर देते थे. वे सभी व्यक्तियों में प्रभु का अंश देखते थे. सार्वजानिक तौर पर अथवा पीठ पीछे बुराई करने वालों को भी वे अपना आशीर्वाद देते थे. उनकी हरसंभव मदद भी करते थे. जलाराम बापा के गाँव वीरपुर में भी उनका एक घोर निंदक था टीलाराम. पेशे से वह किराना दुकानदार था. आर्थिक रूप से वह सक्षम था. कद में वह जरूर ठिगना था, लेकिन कुत्सित विचारों में उंचा था. जितना वह जमीन के ऊपर था, उतना जमीन के नीचे भी. दुकानदारी से जब वह निवृत्त हो जाता तो पैदल बाजार में निकल पड़ता अपने करीबी लोगों की बुराई करने. चहेरे का रंग गोरा था, किन्तु जुबान काली थी. खाली वक़्त में परनिंदा का सुख लेना उसका शगल बन गया था. जो उसकी मदद करता था या अपने साथ रखता था, उसे ही पहले वह अपना निशाना बनाता था. लोगों को अपमानित करने वह अक्सर अवसर की तलाश में रहता. हद तो तब हो जाती, जब टीलाराम जलाराम बापा को भी घेर लेता और फिर धरा का बोझ बताते हुए उन्हें संतुलन की सीख देता. उन्हें ढोंगी संत साबित करने में अपनी ऊर्जा नष्ट करता. लेकिन उदारमना जलाराम बापा उसकी अपमानजनक बातों और निंदा युक्त बर्ताव का बिलकुल बुरा नहीं मानते थे. वे उसकी बातों को मुस्कुरा कर अनसुना कर देते थे. जिससे खीजवश टीलाराम पागलों की तरह बडबडाते हुए उनके पीछे पीछे घर तक पहुँच जाता. फिर भी जलाराम बापा उसे सम्मान के साथ अपने घर में बैठाते और उसका आथित्य सत्कार करते.
जलाराम बापा जब गंभीर रूप से बीमार हुए, तब टीलाराम भी तबियत की पूछपरख के बहाने उनके घर पहुँच गया. अकेले जाने का साहस नहीं हो रहा था, तो उसने अपने एक रिश्तेदार को भी साथ रख लिया. सभी अनुयायी क्रमवार जलाराम बापा के चरण स्पर्श कर उनसे आशीर्वाद ले रहे थे. टीलाराम किनारे चुपचाप बैठ कर जलाराम बापा के मनोभाव को भांपने की कोशिश कर रहा था. उस पर जब जलाराम बापा की नजर पडी तो उन्होंने उसे इशारे से अपने पास बुलाया और पूछा- "कैसे हो टीलाराम भाई, मजे में हो न?". टीलाराम अपनी पुरानी हरकत से बाज नहीं आया. खुरापात उसके रग रग में थी. उसने व्यंगात्मक लहजे कहा- "बापा, अपनी तो हमेशा मौज रहती
है. आप अपना ध्यान रखो. अब आपकी उम्र बहुत हो गई है, पता नहीं कब आपका राम नाम सत्य हो जाय. खैर,
आपको क्या चिंता है. आपके लिए तो स्वर्ग में जगह निर्धारित है". जलाराम बापा ने मुस्कुराते हुए प्रत्युत्तर दिया- "टीलाराम भाई, तुम्हारा अनुमान सही है, न जाने किस घड़ी में प्रभु श्रीराम का बुलावा आ जाय. वास्तव में प्रभु श्रीराम का नाम सत्य का पर्याय है. किन्तु स्वर्ग में मेरी जगह निर्धारित है या नहीं, यह तो मेरे प्रभु ही जानते हैं".
अनावश्यक बहस और कुतर्क करना टीलाराम के स्वभाव में शामिल था, इसलिए उसने व्यंग बाण छोड़ते हुए कहा- "क्यों बापा आप तो बेरोजगार होते हुए भी रोज भूखे और फटीचरों का पेट भरते हैं, दिन में दस बार भगवान को पूजते हैं, यह क्या कम है. फिर आपको स्वर्ग में जगह क्यों नहीं मिलेगी?". जलाराम बापा ने उसकी व्यंग भरी
जिज्ञासा को शांत करते हुए कहा- "टीलाराम भाई तुम ठहरे पक्के चंट व्यापारी. कर्म के बाद फल की चिंता करना
तुम्हारा धर्म है, किन्तु मैं  प्रभु और दीनदुखियों का निर्धन सेवक हूँ, मेरा धर्म मात्र कर्म करना है, फल की चिंता करना नहीं". टीलाराम तो तय करके आया था आज जलाराम बापा को ठीक करना है. उसने चुटकी लेते हुए कहा- "बापा, मैंने सुना है आपको लेने स्वर्ग से हवाई रथ आने वाला है?" जलाराम बापा हँसे और फिर पूछा- "क्यों तुझे मेरे साथ चलना है क्या?" टीलाराम बोला- "हाँ, बापा आपके सिवाय मुझे और कौन स्वर्ग के हवाई रथ में बैठा कर ले जाएगा. मुझे उस दिन का बेसब्री से इन्तजार रहेगा". जलाराम बापा ने यह कह कर बातचीत ख़त्म करनी चाही- "ठीक है टीलाराम भाई, स्वर्ग से जब हवाई रथ मुझे लेने आयेगा तो तुझे भी अपने साथ लेता जाउंगा".
टीलाराम की व्यंगात्मक लहजे वाली बातों को आसपास खड़े स्थानीय अनुयायी भी सुन रहे थे. हालांकि वे उसके
स्वभाव से परिचित थे, लेकिन टीलाराम द्वारा मौके की नजाकत को न समझने के कारण अनुयायी उस पर नाराज हो गए. जलाराम बापा ने सबको शांत रहने का इशारा किया. बात न बढे, इसलिए एक बुजुर्ग अनुयायी टीलाराम का हाथ पकड़ कर उसे बाहर ले गए और उसे विदा किया.
महा वदी नवमीं, मंगलवार की देर रात को टीलाराम जल्दी से नित्य कर्म से निवृत्त हुआ और जेतपुर जाने के लिए निकल पडा. वीरपुर गाँव से जेतपुर की दूरी आठ मील थी. वह जेतपुर से ही सामान लाकर बेचा करता था. वह दसमी, बुधवार की सुबह ही जेतपुर पहुँच गया. शीघ्रता से वह जरूरत का सामान खरीद कर वापस वीरपुर गाँव के लिए रवाना हो गया. वीरपुर गाँव पहुँचने के लिए अभी उसे तीन मील और चलना बाकी था, तभी उसे सामने से एक सुसज्जित रथ आता दिखाई दिया. टीलाराम सोचने लगा जरूर यह रथ किसी राजा महाराजा का होगा. अचंभित होकर वह आते हुए रथ को देखने लगा. अगले ही पल वह रथ उसके पास आकर रूक गया. गौर
से देखा तो उसकी आँखें चौंधिया गई. उसमें कोई और नहीं बल्कि स्वयं जलाराम बापा बैठे हुए थे. जलाराम बापा
को बैठा देख कर उसकी खुरापात जागृत हो गई. टीलाराम ने व्यंग कसा- "क्या बापा, किसी राजा का बुलावा आया है क्या?'. जलाराम बापा बोले- "हाँ टीलाराम भाई". उसने कहा- "आप ही की ऐश है. वैसे बताओ तो सही किस राजा के मेहमान बन कर जा रहे हो, किसने भेजा है यह रथ".जलाराम बापा ने अर्थपूर्ण मुस्कान के साथ संक्षिप्त प्रत्युत्तर दिया- "श्रीराम ने". वह मजाक उड़ाते हुए बोला- "इसका मतलब यह राजा का रथ नहीं बल्कि स्वर्ग का रथ है".जलाराम बापा ने कहा- "टीलाराम भाई, मैंने तुझसे वादा किया था स्वर्ग से जब हवाई रथ मुझे लेने आयेगा तो तुझे भी अपने साथ लेता जाउंगा, अब वह क्षण आ गया है, यह सब सामान छोड़ और बैठ मेरे साथ, हम स्वर्ग साथ चलेंगे". स्वर्ग का नाम सुनते ही टीलाराम की सिट्टी पिट्टी गम हो गई, उसकी हालत पतली हो गई, पसीने से वह तरबतर हो गया, भय से उसका पायजामा भी गिला हो गया. जलाराम बापा हंसते हुए
बोले- "चल जल्दी बैठ टीलाराम भाई , स्वर्ग जाने में देर हो रही है". उसने कन्नी काटते हुए कहा- "बापा, आपको ही मुबारक हो स्वर्ग, मुझे नहीं चलना है आपके साथ, मैं यहीं खुश हूँ". जलाराम बापा बोले- "फिर ये न कहना बापा रथ में बैठ कर अकेले स्वर्ग चले गए, और मुझे पूछा तक नहीं". टीलाराम ने टरकाने के अंदाज में जवाब दिया- "बापा, जल्दी निकल लो, आपको देर हो जायेगी. ऐसा होता है क्या स्वर्ग का रथ?" जलाराम बापा ने शांत भाव से कहा- "ठीक है, जैसी तुम्हारी इच्छा, राम-राम". फिर अगले ही पल जलाराम बापा का स्वर्ग रथ टीलाराम की नज़रों से ओझल हो गया.
टीलाराम बडबडाते हुए आखिरकार वीरपुर गाँव पहुँच गया और फिर दुकानदारी में व्यस्त हो गया. उधर, ग्रामवासी शमशान से लौट रहे थे. उन्हें देख कर टीलाराम सड़क पर आया और एक ग्रामीण से पूछा- "क्या भाई, किसका राम नाम सत्य हो गया है?". उसने भी आश्चर्य से पूछा- "अरे टीलाराम, तुझे नहीं मालूम पड़ा क्या, जलाराम बापा स्वर्ग सिधार गए हैं". यह सुनते ही टीलाराम सन्न रह गया. उसके ज्ञान-चक्षु खुल गए. उसे अपनी
गंभीर गलती समझ में आ गई. स्वर्ग जाने का सुनहरा अवसर उसने अज्ञानतावश गवां दिया. उसे बेहद पछतावा
होने लगा. वह अपना सर पटक पटक कर रोने लगा. यह अप्रत्याशित दृश्य देख कर लोग इकट्ठे हो गए. उन्हें ताज्जुब हुआ टीलाराम तो जलाराम बापा का घोर निंदक है, फिर क्यों वह उनके स्वर्गवासी होने पर दहाड़ मार मार रो रहा है. जब उससे बुजुर्ग अनुयायी ने रोने का कारण पूछा तो टीलाराम ने बताया- "भाई, मैं अपने दुर्भाग्य
पर रो रहा हूँ. मेरे कर्म ख़राब है इसीलिये मैंने जलाराम बापा के आग्रह को ठुकरा कर स्वर्ग जाने का अमूल्य अवसर खो दिया.मेरी मति भ्रष्ट हो गई थी". यह सुन कर सभी लोग अचंभित रह गए. जलाराम बापा के प्रति लोगों की श्रद्धा और अधिक बढ़ गई. उधर, घोर निंदक टीलाराम का भी ह्रदय परिवर्तन हो गया. वह अब दिन रात
जलाराम बापा के गुणगान करने लगा था. बापा के आदर्शों को अपना कर वह दीनदुखियों की सेवा में जुट गया. जलाराम बापा की स्मृतियाँ और उनके जीवन-आदर्श सेवा कार्यों के लिए प्रेरणा के स्त्रोत बन गए. (इतिश्री) ,   (लेखक- दिनेश ठक्कर "बापा"), (जलाराम बापा के प्रचलित किस्से और किवदंतियों पर आधारित)                                    .                                                                  .                          

Jalaram bapaa kee jeewan-kathaa ( 39 )

मृत्यु के बाद मुंह बोली बहन से मुलाक़ात : जलाराम बापा अपनी नश्वर देह को त्याग कर स्वर्गवासी हो चुके थे. उनकी काया की अंतिम यात्रा प्रारम्भ हो गई थी. लेकिन स्वर्ग लोक की ओर जाते जाते भी जलाराम बापा की दो मुलाकातें इस मायावी धरा पर शेष थीं, जो बाद में वीरपुर वासियों के संज्ञान में आयीं भी.
हुआ यूं, जलाराम बापा तीन भाइयों में मंझले थे, लेकिन उनकी कोई बहन नहीं थी. इसलिए उन्होंने अपने गाँव वीरपुर की निवासी गलाल बाई को अपनी मुंह बोली बहन बनाया था. वह जलाराम बापा को स्नेह से जला भाई के नाम से संबोधित करती थीं. रक्षाबंधन के दिन वे जलाराम बापा को राखी बांधना नहीं भूलती थीं. रक्षा सूत्र बाँध कर वे जलाराम बापा को लम्बी उम्र देने प्रभु से कामना करती थीं. हर प्रसंग पर वे मौजूद रहती थीं. दोनों के बीच सगे भाई-बहन से भी ज्यादा स्नेह था. जब जलाराम बापा रोगग्रस्त होकर सदा के लिए बिस्तर पर ही लेटने को विवश हो गए थे, तब गलाल बाई जलाराम बापा का कुशलक्षेम जानने उनके पास नम आँखों के साथ आयीं. बिस्तर के निकट आते ही उन्होंने रोते हुए जलाराम बापा से पूछा- "जला भाई, तबियत कैसी है?'. जलाराम बापा शांत भाव से बोले- "गलाल बेन, इस नश्वर देह की सजा स्वीकार करनी पड़ती ही है. यह तो विधि का विधान है. तुम अपना हालचाल बताओ, कैसी हो?". वह रूआंसी होकर बोली- "जला भाई, मैं तो ठीक हूँ, किन्तु आपका इस तरह गंभीर रूप से बीमार होकर बिस्तर का साथी बन जाना समझ में नहीं आ रहा है. आपके आशीर्वाद से भक्तों का बड़े से बड़ा रोग पल भर में समाप्त हो जाता है, तो फिर आपको रोग इस तरह क्यों सता रहा है?". जलाराम बापा ने संक्षिप्त जवाब दिया- "यह भी प्रभु की इच्छा है, अपनी कोई बात हो तो बताओ". उन्होंने हाथ जोड़ कर कहा- "जला भाई, आपकी तबियत देख कर कहीं जाने का मन नहीं कर रहा है. किन्तु उमरावी गाँव से मेरे भाई रूपा ने सेवक भेज कर मुझे बुलवाया है. अगर आपकी आज्ञा हो तो आज एक दिन के लिए चली जाऊं". जलाराम बापा ने अनुमति देते हुए कहा- "ठीक है गलाल बेन, जाओ, भाई ने इतने स्नेह से बुलाया है तो तुमको जाना ही चाहिए. किन्तु वहां एक दिन से अधिक नहीं रूकना, मेरा कोई ठिकाना नहीं है". तत्पश्चात गलाल बाई तुरंत अपने भाई रूपा के गाँव जाने के लिए रवाना हो गई. रूपा भाई के घर पहुंचने पर गलाल बाई का आत्मीय स्वागत हुआ. कई दिनों बाद बहन घर आई थी, इसलिए रूपा भाई बेहद खुश हुए, लेकिन उनकी बहन का पूरा ध्यान वीरपुर में लगा हुआ था, जलाराम बापा की याद उन्हें रह रह कर आ रही थी. दूसरे दिन सुबह होते ही उन्होंने रूपा भाई से वीरपुर लौटने की इजाजत माँगी. उन्होंने कहा- "भाई, मुझे अभी वीरपुर वापस जाना है. जला भाई की तबियत बहुत खराब है, इसलिए मैं यहाँ अब अधिक नहीं रूक सकती". रूपा भाई ने जिद करते हुए कहा- "बहन, इतने दिनों बाद भाई के घर आई हो. एक दिन में ही वापस लौटने की बात कर रही हो. एक दो दिन और रूक जाओ". भाई की जिद के आगे गलाल बाई को मजबूर होकर झुकना पडा. वे उस रात रूक गई.
तीसरे दिन गलाल बाई वीरपुर के लिए प्रस्थान की. शाम के करीब चार बज रहे थे. अभी भी वीरपुर दो मील दूर था. एकाएक सामने से जलाराम बापा आते हुए गलाल बाई को दिखे. वह चौंक गयीं. गलाल बाई ने देखा जलाराम बापा के हाथ में पानी की मटकी थी. गलाल बाई प्रसन्न हो गई. वह उनके पास जाकर बोली- "अरे जला भाई, आप
इस समय यहाँ?, इतनी तेज धूप में कहाँ जा रहे हैं?" जलाराम बापा ने खुलासा किया- "गलाल बेन, बिस्तर पर सोने के समय मुझे तुम्हारा ख्याल आया. तुम इतनी धूप में आ रही हो तो प्यासी होगी, इसलिए तुम्हारे लिए मटकी में ठंडा पानी लेकर आया हूँ". गलाल बाई ने गदगद होकर कहा- "भाई हो तो ऐसा, आप कितना ध्यान रखते हैं अपनी बहन का". फिर उन्होंने ठंडा पानी पीकर अपना गला तर किया. जहां जलाराम बापा गलाल बाई को पानी पिला रहे थे, वहां बाजू के खेत में उस समय कचरा भाई डोबरिया किसानी कार्य में व्यस्त थे. जलाराम बापा ने उन्हें देख कर जोर से पुकारा- "कचरा भाई, क्या कर रहे हो". जलाराम बापा की आवाज सुन कर कचरा भाई दौड़ कर आ गए और जवाब दिया- "बापा, खेत से ही हमारी रोजी रोटी चलती है. किसानी का काम तो करना ही पडेगा न, नहीं तो बाल बच्चे भूखे मरेंगे". जलाराम बापा ने हंसते हुए कहा- "ठीक बोल रहे हो कचरा भाई, अपना काम ही अपनी पूजा है. अब वीरपुर गाँव चलो, गलाल बेन को तुम्हारा साथ भी मिल जाएगा". कचरा भाई जलाराम बापा के आदेश को सम्मान देते हुए वीरपुर गाँव चलने के लिए तुरंत राजी हो गए. फिर जलाराम बापा
ने गलाल बाई से कहा- "गलाल बेन, सूर्यास्त होने वाला है, मेरे यहाँ साधुसंत आ गए होंगे, मुझे शीघ्र पहुँचना होगा, तुम दोनों आराम से पहुँचो". गलाल बाई ने जवाब दिया- जला भाई, ठीक है. जैसा आपका आदेश". तत्पश्चात जलाराम बापा तेज कदमों से आगे बढ़ गए. अगले ही क्षण वे नज़रों से ओझल हो गए.
उधर, गलाल बाई और कचरा भाई आहिस्ते आहिस्ते चलते हुए वीरपुर गाँव की सीमा में प्रवेश कर गए. सड़क से सटे शमशान की तरफ दोनों की दृष्टि गई तो देखा वहां कई लोग बैठे हैं और सामने चिता जल रही है. उत्सुकतावश दोनों वहां पहुंचे. गलाल बाई ने एक परिचित से पूछा- "भाई, किसका देहावसान हो गया है?". उसने
रूंधे गले से जवाब दिया- "अरे गलाल बेन, ताजुब्ब है आपको नहीं मालूम, आपके और पूरे गाँव के जलाराम बापा
प्रभु श्रीराम को प्यारे हो गए हैं, वे हमें अनाथ बना कर इस दुनिया से चले गए हैं". यह सुन कर गलाल बाई के पैरों तले जमीन खिसक गई. वह भौंचक रह गई, इस अशुभ समाचार पर उन्हें भरोसा नहीं हो रहा था. उन्होंने आश्चर्य प्रकट करते हुए कहा- "क्या बोल रहे हो, ऐसा कैसे हो सकता है, अभी कुछ देर पहले ही जला भाई से मेरी भेंट हुई,  उन्होंने मुझे ठंडा पानी भी पिलाया". इतने में दूसरा परिचित बोला- "गलाल बेन, अंतिम सांस लेने से पहले बापा
आपको बहुत याद कर रहे थे. आप तो मात्र एक दिन के लिए भाई के गाँव गई थीं, फिर आने में देर क्यों कर दीं ?". गलाल बेन रोने लगी. रोते रोते वह अपने सर पर हाथ रख कर जमीन पर बैठ गई. वह निरूत्तर हो गई. लोगों ने उसे सांत्वना देकर शांत कराया. कुछ देर बाद वे जलाराम बापा की चिता के निकट गई और परिक्रमा करने के बाद हाथ जोड़ कर कहा- "जला भाई, आपके आदेश की मैंने अवहेलना की, मुझे क्षमा कर दीजिये". यह कह कर वे फिर फूट फूट कर रोने लगीं. अग्नि संस्कार संपन्न होने के बाद सभी अपने अपने घर चले गए. स्नान आदि शुद्धिकरण के पश्चात सभी ग्रामवासी रात को जलाराम बापा द्वारा बनवाए गए मंदिर परिसर में भजन कीर्तन के लिए एकत्रित हुए. गलाल बाई और कचरा भाई भी आये. गलाल बाई ने जलाराम बापा से मुलाक़ात का पूरा वृत्तांत फिर सुनाया तो किसी को विश्वास नहीं हुआ. सबने उसे मन का वहम बताया. तब कचरा भाई ने गलाल बाई की
बात का समर्थन किया और खुद के साक्षी होने का भरोसा दिलाया. तब फिर ग्रामवासियों को गलाल बाई की बात
सत्य लगी. सबने इस घटनाक्रम को जलाराम बापा का ही चमत्कार निरूपित किया. सभी ने जलाराम बापा के जयकारे लगाए तत्पश्चात राम धुन प्रारम्भ की गई. ( जारी )                
                                                      
         

Jalaram bapaa kee jeewan-kathaa ( 38 )

जलाराम बापा का स्वर्गवास : जलाराम बापा के सेवा का चक्र निर्बाध गति से चल रहा था. उधर, समय का पहिया भी अपनी निर्धारित गति से घूम रहा था. सदाव्रत-अन्नदान जैसे पुण्य सेवा कार्य को शुरू किये साठ साल पूरे हो चुके थे. फिर भी जलाराम बापा का सेवा के प्रति उत्साह, लगन और समर्पण भाव यथावत था. बढ़ती उम्र इसमें बिलकुल बाधक नहीं थी. युवाओं की मानिंद उनमें जोश बरकरार था. किसी की भी मदद कहीं भी जाकर करनी हो तो वे सदैव तैयार रहते थे. सेवा के लिए "नहीं" बोलना उनके शब्दकोष में शामिल न था. सेवा और प्रभु भक्ति के सम्मिश्रित जीवन में जलाराम बापा ने अब तक अस्सी वसंत देख लिए थे. हर मौसम इनके सेवा कार्यों में सहभागी था. जलाराम बापा ने अपना पूरा जीवन दीनदुखियों की सेवा और प्रभु श्रीराम की भक्ति
को समर्पित कर दिया था. वृद्धावस्था की सामान्य बीमारियों को वे सेवा कार्यों के नाम पर नजरअंदाज कर दिया करते थे. किन्तु वैशाख माह इनकी शारीरिक व्याधि को प्रतिकूल दिशा में मोड़ने का आधार बना. जलाराम बापा को बवासीर का रोग परेशान करने लगा. तमाम उपचार के बाद भी स्वास्थ्य लगातार बिगड़ते जा रहा था. साल भर तक यह रोग उन्हें पीड़ा पहुंचाते रहा. जलाराम बापा इस रोग के उत्पन्न होने और दर्द भोगने के निहित अर्थ और उसके मूल कारण को भलीभांति समझ रहे थे. विधि के विधान से वे अच्छी तरह परिचित थे. जीवन और मृत्यु के तयशुदा क्रम से वे अवगत थे. इसलिए अपने रोग की पीड़ा को भी वे प्रभु की लीला का ही एक हिस्सा मानते थे. पृथ्वी पर जो भी जन्मा है, उसे एक न एक दिन तय वक़्त में मरना ही है, इस सत्य को वे बखूबी जानते थे. उनकी रोगग्रस्त दशा और पीड़ा को देख कर सभी अनुयायी दुखी थे. रोग के कारण जलाराम बापा का शरीर निरंतर  कमजोर होते जा रहा था. शरीर में ताकत ख़त्म हो रही थी. उन्हें तो इसके अंतिम परिणाम का भी अंदाज था, लेकिन अनुयायियों के लिए उनका ज्यादा बीमार होना सदमा पहुंचाने वाला था. शारीरिक रूप से अशक्त जलाराम बापा को रोग ने आख़िरकार एक दिन बिस्तर का साथी बनने को विवश कर दिया.
जलाराम बापा की असाध्य बीमारी की खबर आसपास के गाँव में तेजी से फ़ैल चुकी थी. फिर पूरे सौराष्ट्र में श्रद्धालुओं को जानकारी मिल गई. जलाराम बापा के दर्शन करने और उनका हालचाल जानने के लिए लोगों का रोज तांता लगने लगा. सभी दिशाओं से अनुयायी वीरपुर गाँव आने लगे. जलाराम बापा के घर के बाहर प्रतिदिन दर्शनार्थियों की लम्बी कतार लगने लगी. जलाराम बापा बिस्तर पर होने के बावजूद आगंतुक सभी श्रद्धालुओं से बात कर उन्हें अपना आशीर्वाद देते. जब श्रद्धालु रोने लगते तो वे अपनी अस्वस्थता को प्रभु की सद इच्छा निरूपित करते, जीवन के असली सत्य और गति को परिभाषित करते. यहीं नहीं बल्कि उन्होंने अपने यहाँ के सदाव्रत-अन्नदान सेवा कार्य को दुगने उत्साह के साथ जारी रखने का निर्देश सेवकों को दिया था.
एक रोज जेतपुर से अनुयायी भीमजी भाई मेहता अपनी पुत्री के विवाह की निमंत्रण-पत्रिका देने जलाराम बापा के घर  आये. वे जलाराम बापा के युवाकाल से ही भक्त थे. वे पहले कई साल तक वीरपुर में रह कर जलाराम बापा के सेवा कार्यों का जिम्मा सम्हाल चुके थे. जब भीमजी भाई ने जलाराम बापा को बेहद अशक्त अवस्था में बिस्तर पर  देखा तो उनकी आँखों से आंसू बहने लगे. जलाराम बापा ने धीमे स्वर में उनसे कहा- "आइये भीमजी भाई, सब कुशल मंगल है न". उन्होंने रोते हुए कहा- "बापा, मैं तो आपकी कृपा से ठीक हूँ, किन्तु आपको यह क्या हो गया?
अब कैसी है आपकी तबियत. आपका बीमार होना हम सब भक्तों को देखा नहीं जा रहा है, आप स्वस्थ रहेंगे तो हम भक्तजन भी तंदुरूस्त रहेंगे". जलाराम बापा ने उन्हें जीवन-दर्शन समझाते हुए कहा- "भीमजी भाई, यह देह  तो नश्वर है. सबको एक न एक दिन इस मायावी संसार से सदा के लिए विदा होना है. कोई पहले जाएगा, कोई बाद में, किन्तु सभी का जाना तय है. यह काया प्रभु ने दी है, उसे समाप्त करने का अधिकार भी प्रभु को ही है. हम सब तो एक कठपुतली मात्र हैं. जीवन की डोर प्रभु के हाथ में ही है. इसलिए इस नश्वर काया को लेकर शोक संतप्त और दुखी होना व्यर्थ है". भीमजी भाई रूआंसे होकर बोले- "बापा, हम सब भक्तों की प्रभु से प्रार्थना है वे आपको शीघ्र स्वस्थ कर दें, मैं अपनी पुत्री के विवाह का आमंत्रण देने आपके पास आया हूँ, बेटी को आपका आशीर्वाद मिलेगा तो उसका वैवाहिक जीवन धन्य हो जाएगा".जलाराम बापा बोले- "भीमजी भाई, तुम मेरी हालत देख तो रहे हो. मेरा अशक्त शरीर विवाह में आने की स्थिति में नहीं है. किन्तु मेरा आशीर्वाद तुम्हारी पुत्री के साथ अवश्य रहेगा, विवाह का मंगल प्रसंग हर्षोल्लास के साथ संपन्न होगा, प्रभु से यह मेरी प्रार्थना है. मेरा अब अंतिम समय आ गया है. उत्तरायण के सूर्योदय के पश्चात यह देह साथ छोड़ देगी, ऐसा मुझे आभास हो रहा है". जलाराम बापा का कथन सुन कर भीमजी भाई समेत वहां मौजूद सभी अनुयायियों की आँखे नम हो गई. सबको अच्छे से मालूम था जलाराम बापा की वाणी की सत्यता के सम्बन्ध में. इसलिए सबके ह्रदय की धड़कने तेज हो गई. दुःख से सबका मन भरी हो गया. फिर जैसे ही भीमजी भाई ने हाथ जोड़ कर कुछ बोलना चाहा तो जलाराम बापा ने उन्हें इशारे से रोका और कहा- "भीमजी भाई, मैं समझ रहा हूँ आप क्या कहना चाह रहे हैं. यह सत्य है अभी हरिराम बच्चा है, किन्तु मेरे प्रभु हरिराम के सदैव सहायक रहेंगे. आप चिंता न करे, सदाव्रत-अन्नदान सेवा कार्य मेरे न रहने के बाद भी चलता रहेगा. हरिराम और आप सब सेवकों पर मुझे पूरा भरोसा है सेवा के इस पवित्र यज्ञ को जारी रखोगे".
महा वदी दसमी, बुधवार का दिन था. प्रतिदिन की तरह जलाराम बापा के घर-आँगन में भजन-कीर्तन चल रहा था. राम धुन चरम स्थिति पर थी. जलाराम बापा भी बिस्तर पर ही लेटकर, आँखें बंद कर अपने प्रभु श्रीराम का जाप कर रहे थे. इसी अवस्था में कुछ क्षण पश्चात जलाराम बापा अपनी नश्वर देह को सदा के लिए त्याग कर प्रभु मिलन के लिए स्वर्ग सिधार गए. श्रद्धालुओं में शोक की लहर छा गई. अनुयायियों की आँखों से आंसू थम नहीं रहे थे. कई अनुयायी जलाराम बापा के बैकुंठ धाम चले जाने पर गम बर्दाश्त नहीं कर सके, वे वहीं मूर्छित हो गए. पूरा वीरपुर गाँव अश्रुपूरित नेत्रों के साथ अंतिम दर्शन के लिए उमड़ पडा. आसपास के इलाके में भी यह शोक समाचार वायु वेग से फ़ैल गया. जलाराम बापा को श्रद्धांजलि देने अनुयायियों का तांता लग गया. सब अपने आपको अनाथ महसूस कर रहे थे. ( जारी )                                                                                    

शनिवार, 7 जनवरी 2012

Jalaram bapaa kee jeewan-kathaa ( 37 )

आथित्य सेवा की अदला बदली : जलाराम बापा जन सामान्य की तकलीफों को दूर करने और उनसे मुलाक़ात करने के लिए यदाकदा ग्रामीण दौरे पर निकल जाते थे. जब भी अगले गाँव जाना होता था, तो वे पहले से ही घुड़सवार सेवक को भेज कर अपने आगमन की सूचना दे देते थे. अक्सर उनके काफिले में कुछ सेवक अनुयायी भी साथ रहते थे. जलाराम बापा अथिति बन कर कभी भी किसी पर बोझ नहीं बनते. जो श्रद्धालु स्वेच्छा से उन्हें आथित्य सत्कार देना चाहता, उसके आमंत्रण को वे सहर्ष स्वीकार कर लेते थे. कुछ ऐसे भी प्रिय अनुयायी थे, जिनके यहाँ वे नियमित तौर पर अतिथि बनते थे. लेकिन यदि आथित्य सत्कार में किसी अनुयायी को कोई परेशानी महसूस होती थी, तो जलाराम बापा दूर से ही उनके मन की पीड़ा को भांप लेते थे. अतिथि बन कर उसे धर्म संकट में नहीं डालते थे. जलाराम बापा तो अन्तर्यामी संत थे. इसलिए वे कभी कभी अपने आथित्य सेवा की अदला बदली भी कर अनुयायी की अप्रत्यक्ष रूप से सहायता भी करते थे. सातुदड गाँव के अनुयायी वीरजी भाई और आम्बा भाई के साथ भी कुछ ऐसा ही घटित हुआ.
यूं तो इस गाँव में जलाराम बापा के कई अनुयायी थे, किन्तु वीरजी भाई और आम्बा भाई उनके ज्यादा करीबी थे. इसलिए जब भी जलाराम बापा इस गाँव में पधारते तो इन्हीं के घर अपना पड़ाव डालते. पूरे गाँव के लोग इससे अवगत थे. जलाराम बापा के आगमन की जानकारी मिलते ही बाजू के ग्रामवासी भी दर्शन करने उमड़ पड़ते थे.
एक दिन वीरजी भाई और आम्बा भाई को एक ग्रामीण ने जानकारी दी- "मोटा भाई, जलाराम बापा का काफिला बाजू के गाँव में ठहरा हुआ है. वे किसी भी समय यहाँ पहुँच सकते हैं. आप उनके आवभगत के सारे प्रबंध कर लीजिये". यह सुन कर दोनों भाई चिंतित हो गए. आथित्य सत्कार के विषय को लेकर वे पशोपेश में पड़ गए. वे सोचने लगे आखिर जलाराम बापा को कहाँ ठहराया जाय, जो उनकी गरिमा और सम्मान के अनुकूल हो. दरअसल, उनकी चिंता की मुख्य वजह यह थी अब तक अपने घर में वे जिस जगह जलाराम बापा को ठहराया करते थे, वहां कपास का ढेर लगा हुआ था. इतना समय नहीं बचा था, उसे चरखे से तत्काल कात सकें. अगर कहीं जलाराम बापा एकाध हफ्ता रूक गए तो चरखे भी नहीं चल पायेंगे और कपास का ढेर यूं ही पडा रह जाएगा. यही सोच कर वे दोनों भाई विचलित हो गए. इस बात से भी वे चिंतित थे जलाराम बापा ने हमेशा की तरह इस बार घुड़सवार के जरिये अपने आगमन की विधिवत सूचना क्यों नहीं भिजवाई. यदि पहले से खबर होती तो वे साफ़ सफाई करवा लिए रहते. कपास को चरखे से कतवा कर बाजार भिजवा दिए रहते. दोनों भाइयों में अभी यह विचार मंथन हो रहा था, तभी एक ग्रामीण हाँफते हुए आया और उनसे बोला- "मोटा भाई, जलाराम बापा गाँव की सीमा तक पहुँच चुके हैं". दोनों भाई हडबडा गए. वीरजी भाई ने आम्बा भाई से कहा- "भाई, अब कुछ सोचने समझने का समय नहीं बचा है, जल्दी से कपास के ढेर को कपडे से ढकवा देते हैं. बापा आते ही होंगे". फिर उन्होंने अपने सबसे छोटे भाई पीताम्बर को आदेशित करते हुए कहा- "पीताम्बर, दौड़ते हुए जा और बापा की सम्मान के साथ अगवानी कर उन्हें यहाँ ले आ. हम भी पीछे पीछे आ रहे हैं".
वीरजी भाई और अम्बा भाई ने फुर्ती दिखाते हुए कपास के ढेर को कपडे से ढकवा दिया, आसपास हल्की साफ़ सफाई करवा दी. फिर दोनों भाई चल पड़े जलाराम बापा का स्वागत करने. वे कुछ कदम आगे बढे थे, सामने से
पीताम्बर आता दिखा. उसके चहेरे की रंगत उडी थी. वीरजी भाई ने उससे पूछा- "अरे पीताम्बर, तू अकेला कैसे आ गया. बापा कहाँ हैं?. रूआंसा होकर पीताम्बर बोला- "बापा इस बार खोजावाले दरवाजे के बजाय बड़े दरवाजे से
होकर गाँव में आये हैं". दोनों भाई हतप्रभ हो गए और दुखी भी. आम्बा भाई ने कहा- "ऐसा पहली बार हुआ है जब बापा के स्वागत करने का सौभाग्य हमें नहीं मिला". उधर, बड़े दरवाजे के पास वीरजी भाई के चाचा प्रेमजी भाई
का घर था. जैसे ही प्रेमजी भाई को जलाराम बापा के काफिले के आने की जानकारी मिली, वे घर से बाहर निकले और स्वागत करने के लिए मार्ग के बीचोंबीच खड़े हो गए. उन्हें सड़क के मध्य खडा देख कर जलाराम बापा ने काफिला रूकवा दिया. प्रेमजी भाई ने हाथ जोड़ कर जलाराम बापा से निवेदन किया- "बापा, इस बार मुझे सेवा करने का अवसर प्रदान कीजिये. आपके चरणों की धूलि से मेरा घर पवित्र हो जाएगा". जलाराम बापा ने स्मित
मुस्कान के साथ निमंत्रण स्वीकार करते कहा- "ठीक है भाई, मेरी दृष्टि में तो सभी लोग बराबर हैं. इस बार तुम्हारे घर रूक जाते हैं". जलाराम बापा की स्वीकारोक्ति से प्रेमजी भाई प्रसन्न हो गए. वे आदरपूर्वक जलाराम बापा और उनके काफिले को ठहराने अपने घर के भीतर ले गए. प्रेमजी भाई के एक इशारे पर उनके कर्मचारियों ने तत्काल आथित्य सत्कार का समस्त प्रबंध कर दिया.
इसी बीच प्रेमजी भाई के तीनों भतीजे भी वहां आ गए. आते ही वीरजी भाई ने दुखी भाव से पूछा- "काका, आदरणीय बापा कहाँ बैठे हैं". प्रेमजी भाई ने सामने के कमरे की तरफ उंगली दिखाई. वे फुर्ती से कमरे में दाखिल हुए. जलाराम बापा विश्राम की मुद्रा में बैठे हुए थे. तीनों भतीजों ने जलाराम बापा के चरण स्पर्श किये. फिर वीरजी भाई ने हाथ जोड़ कर उदासी भरे स्वर में कहा- "बापा, हमसे कोई गलती हो गई है क्या? आपने हमें इस बार ऐसी सजा क्यों दी? इस बार आप हमारे घर नहीं पधारे, जबकि हर बार हमें आपके आथित्य का सौभाग्य नसीब होता  है". जलाराम बापा ने हंसते हुए प्रत्युत्तर दिया- "भाई, और कुछ कहना हो तो कह दो, संकोच नहीं करो. तुमको बोलने का पूरा अधिकार है". वीरजी भाई ने सर झुकाते हुए कहा- "बाकी बात तो आप जानते ही हैं, आपसे से कौन सी बात कभी छिपी है". जलाराम बापा बोले- "मैं सब बात जानता हूँ, इसीलिये तो तुम्हारे घर न आकर प्रेमजी भाई के घर रूका हूँ". वीरजी भाई ने आश्चर्यचकित होकर पूछ- "आपको किसने हमारी समस्या से अवगत कराया?'  जलाराम बापा ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया- "मुझे मेरे प्रभु ने तुम्हारी दुविधा के विषय में सब बता दिया है. कपास का ढेर पडा है तुम्हारे यहाँ, मेरे रूकने से तुम्हें परेशानी होती. मैं अपने भक्तों को कभी परेशान होते देख नहीं सकता. अतिथि तो भगवान् होता है, बोझ नहीं. मैं भगवान् नहीं हूँ किन्तु भक्तों पर कभी बोझ नहीं बनता. इसीलिये इस बार बड़े दरवाजे से होकर गाँव में प्रवेश किया. प्रेमजी भाई ने प्रेम से बुलाया तो इनके घर रूक गया. यह घर भी तो तुम्हारे ही काका का है". यह सुन कर वीरजी भाई निरूत्तर हो गए. आगे वे कुछ बोलने की स्थिति में नहीं थे. फिर जब तक जलाराम बापा का पड़ाव रहा तब तक प्रेमजी भाई के तीनों भतीजे भी सारा कामकाज छोड़ कर चाचा के यहाँ रह कर जलाराम बापा की सेवा में दिन रात जुटे रहे. ( जारी )                              
                                                                            
             

Jalaram bapaa kee jeewan-kathaa ( 36 )

भूतों का भय दूर किया : जलाराम बापा के चरण जहाँ पड़ते थे, वह जगह स्वतः पवित्र हो जाती थी. उनकी उपस्थिति मात्र से हर किसी का कल्याण हो जाता था, फिर चाहे वह इंसान हो या कोई और. एक रोज जलाराम बापा अपने कुछ सेवकों के साथ झींझुडा गाँव जा रहे थे. वहां महात्मा कानडगर की स्मृति में संत मेले का आयोजन किया गया था. इसमें शामिल होने जलाराम बापा को भी निमंत्रण मिला था.
जलाराम बापा सुबह से ही झींझुडा गाँव जाने के लिए घर से निकल गए थे. दोपहर को जब सफ़र के दौरान रास्ते में जाडिया कोटडा गाँव आया, तब कुछ देर आराम करने के उद्देश्य से जलाराम बापा अपने सेवकों के साथ एक पुराने बरगद के पेड़ के नीचे रूक कर डेरा डाल दिया. जलाराम बापा के रूकने की खबर अन्य राहगीरों के जरिये पूरे गाँव में तेजी से फ़ैल गई. उनके दर्शन के लिए श्रद्धालु ग्रामवासी उमड़ पड़े. गाँव के मुखिया सहित कुछ लोग भोजन भी साथ लाये थे. जलाराम बापा ने उसे सहर्ष स्वीकार कर लिया. भोजन उपरान्त जलाराम बापा से श्रद्धालुओं ने गाँव के भीतर चलने का अनुरोध किया. मुखिया ने हाथ जोड़ कर कहा- "बापा, आप हमारे गाँव के अन्दर पधारेंगे तो हम सब गाँव वालों के भाग्य खुल जायेंगे. हमारा गाँव धन्य हो जाएगा". जलाराम बापा बोले- "भाइयों, मैं संत मेले में सम्मिलित होने के लिए झींझुडा गाँव जा रहा हूँ. वहां मुझे शीघ्र पहुँचना है. इसलिए मैं अभी आप लोगों के साथ चलने में असमर्थ हूँ. हाँ, लौटते समय अगर आप लोग कहेंगे तो अवश्य आ सकता हूँ". मुखिया ने मायूस होकर कहा- "बापा, ठीक है जैसा आप उचित समझे. वापसी के समय हम लोग आपका सानिध्य ले लेंगे. बापा, आपसे एक और विनती है, आप आदेश दे तो कहूं". जलाराम बापा ने विनम्रता से कहा- "भाई, मैं तो आप लोगों का ही सेवक हूँ, कोई भी कार्य हो, संकट हो, बताओ. कहने में संकोच मत करो". मुखिया के चहेरे पर भय का भाव झलकने लगा. उसने दबी जुबान में कहा- "बापा, आप अभी जिस बरगद के पेड़ के नीचे बैठे हैं, दरअसल उस पर भूतों का वास है. भूतीया पेड़ होने के कारण राहगीर यहाँ से गुजरने पर कतराते हैं, वे डरते हैं. गाँव वालों का मानना है कुछ लोग जो पागल हुए हैं उसकी वजह यही पेड़ है. कुछ लोगों की मौत भूतों के भय के कारण भी हो चुकी है. बापा, अब आप ही हमें इस संकट से छुटकारा दिला सकते हैं".
जलाराम बापा थोड़ी देर मौन रहे. तत्पश्चात खड़े होकर उन्होंने सर ऊपर किया और पेड़ पर अपनी दृष्टि दौड़ाई. फिर जलाराम बापा ने मुस्कुराते हुए कहा- "भाई, डरने वाली कोई बात नहीं है. आप लोगों के भीतर का भय मैं अभी सदा के लिए दूर किये देता हूँ". इतना कहकर जलाराम बापा ने अपनी आँखें बंद की और प्रभु श्रीराम का जप करने लगे. इसके बाद उन्होंने पेड़ की परिक्रमा प्रारम्भ की. उन्होंने जैसे ही पेड़ के सात फेरे पूरे किये, वैसे ही जोर की गडगडाहट हुई. बरगद के पेड़ की शाखाएं हिलने लगी. पुनः गडगडाहट होने से वहां मौजूद ग्रामवासी सहम गए. लोग भय से कांपते हुए एक दूसरे का हाथ पकड़ लिए. अगले ही क्षण जलाराम बापा ने हंसते हुए कहा- "भाइयों, अब से आप लोग भूतों के भय से सदा के लिए मुक्त हो गए हैं और इन भूतों को भी मुक्ति मिल गई है. आपके साथ साथ इन भूतों का भी उद्धार हो गया है. अब डरने की कोई आवश्यकता नहीं है. आप लोग बिना डरे अब यहाँ से आनाजाना कर सकते हैं. कोई किसी को अबसे परेशान नहीं करेगा. यहाँ भूतों का वास सदा के लिए समाप्त हो गया है". यह खुशखबरी सुन कर ग्रामवासी प्रसन्न होकर झूमने लगे, सबने जलाराम बापा के जयकारे लगाए. फिर सभी ने क्रमवार जलाराम बापा के चरण स्पर्श कर आभार जताया. कुछ देर बाद जलाराम बापा अपने सेवकों के साथ गंतव्य स्थान के लिए रवाना हो गए. ( जारी )
                                                            

शुक्रवार, 6 जनवरी 2012

Jalaram bapaa kee jeewan-kathaa ( 35 )

संत मेले में वस्त्र दान का चमत्कार : जलाराम बापा संकट अथवा अभाव की स्थिति में हर किसी की मदद करने के लिए हमेशा तत्पर रहते थे. राजा हो या रंक, जो भी उनसे सहायता करने का आग्रह करता, उसे कभी निराश नहीं करते. राजा रणमलजी भी जलाराम बापा से सहायता प्राप्त करने वालों में से एक थे.
हुआ यूं, एक दिन राज ज्योतिषी ने राजा रणमलजी की जन्म कुण्डली और हस्त रेखा का अध्ययन कर भविष्यवाणी की- "महाराज, आपकी कुण्डली और हाथ की रेखाओं से ज्ञात होता है, आपकी आयु अधिक नहीं है. आपके जीवन पर ख़तरा मंडरा रहा है. राजदरबारियों को भी इस भविष्यवाणी की जानकारी हो गई थी, इसलिए राजा की तरह वे भी चिंतित हो गए. संयोगवश कुछ दिन बाद राजा ग्राम जाम खंभालिया गए, जहां उनकी मुलाक़ात मोरार भगत से हुई. संकट के वक़्त राजा इनसे सदैव मार्गदर्शन लिया करते थे. सो, राजा ने मोरार भगत को राज ज्योतिषी द्वारा की गई भविष्यवाणी के सम्बन्ध में विस्तार से बताया. अपनी चिंता से भी उन्हें अवगत कराया. उन्होंने हाथ जोड़ कर निवेदन किया- "भगत जी, अब आप ही मेरा कल्याण कर सकते हैं. मेरी आयु बढ़ जाय, ऐसा कोई उपाय हो तो कृपया बताइये". मोरार भगत ने शांतचित्त होकर प्रत्युत्तर दिया- "महाराज, विधि के विधान को बदलना आसान नहीं है. जो भाग्य में लिखा रहता है, वह होकर रहता है, किन्तु हम जो भी पुण्य कर्म करते हैं, उसका प्रभाव भी भाग्य परिवर्तन में देखने को मिलता है. अच्छे कार्य का फल मिलता अवश्य है. और अगर संत महात्माओं का आशीर्वाद मिल जाय तो सोने में सुहागा हो जाता है. हो सकता है पुण्य कर्म करने से आपका संकट दूर हो जाय". राजा की आँखें चमक उठी. उन्होंने तपाक से पूछा- "भगत जी, इसका अर्थ है मेरी आयु बढ़ सकती है, मुझे क्या करना होगा, कृपया बताइए". उन्होंने सुझाव देते हुए कहा- "महाराज, आप अपने यहाँ भव्य संत मेले का आयोजन कराइए, उनकी सच्चे मन से सेवा कीजिये, इसका लाभ आपको अवश्य मिलेगा". राजा ने सहमत होकर जवाब दिया- भगत जी, मैं आपकी सलाह का पालन अवश्य करूंगा. संत मेले का आयोजन आपके ही नेतृत्व में होगा, आप अनुमति दीजिये". मोरार भगत ने राजा के आग्रह को स्वीकार कर लिया. तत्पश्चात वे दोनों राजमहल के लिए प्रस्थान कर गए.
राजा ने जलाराम बापा सहित सभी संत महात्माओं को निमंत्रण भिजवाया. नियत तिथि को संत मेला प्रारंभ हो गया. इस मेले में सैकड़ों संत, महात्मा, साधु, सन्यासी, वैरागी, ब्रम्हचारी और भक्त जन शामिल हुए. वीरपुर से जलाराम बापा और जोड़ीया गाँव से धरमशी भगत विशेष तौर पर निमंत्रित किये गए थे. मोरार भगत अपनी देखरेख में इस मेले का सुचारू संचालन कर रहे थे. अतिथियों की आवभगत में कोई कमी न हो इसलिए राजा ने कई सेवकों को तैनात कर रखा था. रहने और खाने का माकूल प्रबंध किया गया था. संत मेले में सेवा के जरिये राजा सबका दिल से आशीर्वाद लेने को लालायित थे. संत मेले में रोज भजन कीर्तन का क्रम जारी रहा.
मेले के समापन अवसर पर भजन-कीर्तन मंच से संचालक मोरार भगत ने अपने आभारयुक्त संबोधन में कहा- "आप सभी अतिथियों का मैं महाराज की ओर से आभार प्रकट करता हूँ. आप सबने यहाँ पधार कर महाराज को
उपकृत कर दिया है. आप लोगों के दर्शन और सानिध्य पाकर महाराज धन्य हो गए हैं. महाराज को मैं दीर्घायु होने का आशीर्वाद देता हूँ. आशा है आप लोग भी महाराज को अपना आशीर्वाद देंगे, जिससे वे लम्बे समय तक
सेवा कार्य कर सकें". इनके संबोधन के बाद जलाराम बापा समेत सभी लोगों ने महाराज को दीर्घायु होने का आशीर्वाद दिया. संत मेले का विधिवत समापन "वस्त्र दान" से होना निर्धारित था. राजा ने पहले से ही वस्त्र मंगवा
लिए थे. लेकिन संत मेले में अनुमान से कई गुना ज्यादा अतिथियों के आगमन से वस्त्रों की कमी महसूस होने लगी. राजा चिंतित हो गए. उनका दिमाग काम नहीं कर रहा था. कोई उपाय नहीं सूझने पर उन्होंने मोरार भगत
को अपनी परेशानी बताई. सुन कर मोरार भगत मुस्कुराए और आत्मविश्वास के साथ कहा- "जलाराम बापा के रहते आप क्यों परेशान हो रहे हो. जहां जलाराम बापा उपस्थित रहते हैं, वहां किसी वस्तु की कमी नहीं रहती है".
राजा ने जिज्ञासा वश पूछा- "क्या सचमुच ऐसा संभव है?". मोरार भगत ने भरोसा दिलाते हुए कहा- "मैं सच कह रहा हूँ, चाहो तो आप परख कर देख सकते हैं. मेरी मानो तो आप वस्त्र दान जलाराम बापा के हाथों से ही करवाइए, फिर देखना उनका चमत्कार कैसा होता है". राजा प्रसन्न हो गए और कहा- "भगत जी, अगर ऐसा होता है तो मेरी प्रतिष्ठा पर कोई आंच नहीं आयेगी". इस विचार-विमर्श के तुरंत बाद राजा जलाराम बापा के पास गए. उन्होंने हाथ जोड़ कर निवेदन किया- "बापा, आप अगर मेरी सहायता करेंगे तो मेरी लाज बच जायेगी. मैं चाहता हूँ अतिथियों को वस्त्र दान आपके हाथों से संपन्न हो". जलाराम बापा राजा के अंतर्मन को भांप चुके थे. उन्होंने कहा- "ठीक है महाराज, जैसी प्रभु की इच्छा, चलिए". फिर राजा के साथ मेले में पहुँच कर जलाराम बापा ने एक एक कर अतिथियों को वस्त्र बांटना शुरू किया. एक भी अतिथि वस्त्र पाने से वंचित न रहा. सभी वस्त्र पाकर प्रसन्न हो गए. जलाराम बापा का यह चमत्कार देख कर राजा आश्चर्यचकित रह गए. मोरार भगत का अनुमान सत्य साबित हुआ. राजा ने जलाराम बापा के चरण स्पर्श किये और आभार जताया- "बापा, आप कोई साधारण संत नहीं हैं, बल्कि भगवान् श्रीराम के अवतार हैं. सौराष्ट्र की भूमि धन्य हो गई है. आपका उपकार मैं सदैव याद  रखूंगा. अपना शेष जीवन परोपकार और सेवा कार्यों को समर्पित कर दूंगा". तत्पश्चात राजा ने जलाराम बापा सहित सभी अतिथियों को नम आँखों से विदाई दी. ( जारी )