शनिवार, 31 दिसंबर 2011

Jalaram bapaa kee jeewan-kathaa ( 31 )

बेटी के पोते हरिराम को उत्तराधिकारी बनाया : जलाराम बापा ने अपना सारा जीवन घर संसार के बजाय सेवा और भक्ति संसार के नाम समर्पित कर दिया था. दीनदुखियों और अपने अनुयायियों को ही वे अपनी संतान मानते थे. यद्दपि पारिवारिक तौर पर उनकी एक मात्र संतान पुत्री जमुना बेन थी. जलाराम बापा का कोई पुत्र न था. उनकी एकलौती पुत्री जमुना बेन सर्व गुण संपन्न थी. पिताश्री जलाराम बापा की तरह वे भी भक्ति भाव से ओतप्रोत थीं. जलाराम बापा ने अपनी एकलौती पुत्री जमुना बेन का विवाह अत्यंत सादगीपूर्ण तरीके से कोटडा पीठा निवासी जसुमा के पुत्र भक्तिराम के साथ किया था. जमुना बेन के दो पुत्र काना भाई और रामजी भाई थे.  जमुना बेन के बड़े बेटे काना भाई में तुलनात्मक रूप से भक्ति और सेवा भाव अधिक था. वे एक संत पुरूष सदृश्य थे. प्रभु भक्ति और सेवा का वातावरण उन्हें अच्छा लगता था, इसलिए वे वीरपुर गाँव में अपने नाना जलाराम बापा के घर में ही रहते थे. काना भाई की चार संतान थी. पुत्र हरिराम बड़े थे. जबकि तीन पुत्री क्रमशः कुंवर फईबा, राम फईबा और कशणी फईबा थी. काना भाई के छोटे भाई रामजी भाई की कोई संतान नहीं थी.
काना भाई के पुत्र हरिराम बाल्यकाल से ही मेधावी, दयालु और प्रभु भक्त थे. जलाराम बापा अपनी एकलौती संतान जमुना बेन के पोते हरिराम को बेहद पसंद करते थे. वह जलाराम बापा के मन मानस में वात्सल्य भाव से प्रतिस्थापित हो गया था. हरिराम को ही अपना उत्तराधिकारी बनाने जलाराम बापा ने तय कर लिया था. वे अपने मन की इच्छा को सार्वजनिक तौर पर जाहिर करने के सही अवसर की प्रतीक्षा में थे. दिन बीतते गए. बालक हरिराम की उम्र बढ़ने लगी थी. आयु के साथ साथ उसकी बौद्धिक परिपक्वता और सदगुणों में भी बढ़ोत्तरी हो रही थी. पढ़ाई के प्रति लगन होने के बावजूद प्रभु भक्ति में उसका मन अधिक लगता था. जलाराम बापा उसकी हर गतिविधियों पर पैनी नजर रखते थे. इसलिए वे आत्म संतुष्ट और निश्चिन्त थे हरिराम भविष्य में भी उनके द्वारा जारी सेवा कार्यों की अलख जागृत रख सकेगा.
हरिराम ने अब तक बारह वसंत देख लिए थे. एक दिन फिर वह गौरवमयी अवसर भी आ गया जिसकी जलाराम बापा बेसब्री से प्रतीक्षा कर रहे थे. सुबह का वक़्त था. हरिराम नित्य कार्य से निवृत्त होकर स्कूल जाने के लिये घर से निकल रहा था, तब जलाराम बापा ने उसे अपने पास बुलाया और पूछा- "बेटा हरिराम, कहाँ जा रहे हो?" हरिराम ने जलाराम बापा के चरण स्पर्श करते हुए प्रत्युत्तर दिया- "बापा, विद्यालय जा रहा हूँ, मेरे लिए कोई आदेश हो तो बताइये". जवाब सुनने के बाद जलाराम बापा क्षण भर के लिए विचारमग्न हो गए. मानो वे अपने प्रभु श्रीराम से कोई गंभीर विचार विमर्श कर रहे हों. अगले ही पल उन्होंने हरिराम के सर पर स्नेहपूर्वक हाथ फेरा और आदेशपूर्ण लहजे में बोले- "बेटा हरिराम, आज से तुझे अब विद्यालय जाने की कोई आवश्यकता नहीं है. तुझे आज से ही यहाँ के सेवा कार्यों का उत्तरदायित्व सम्हालना है. आज से तू मेरा वारिस है". जलाराम बापा का यह निर्णय सुन कर हरिराम चौंक गया. उसे सुखद आश्चर्य भी हुआ, लेकिन जलाराम बापा से इस विषय में जिज्ञासा वश कोई पूछताछ करने का साहस उसमें नहीं था, इसलिए तत्काल उसने अपनी सहमति देते हुए हाथ जोड़ कर कहा- "बापा, यह मेरा सौभाग्य है जो आपने मुझे इस उत्तरदायित्व के योग्य समझा. मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ आपका प्रत्येक सेवा-आदेश मेरे प्राणों से अधिक प्रिय होगा". जलाराम बापा उसके विचार सुन कर प्रसन्न हो गए और उसे गले लगा लिया. जलाराम बापा की कोई ऐसी जमीन-जायदाद या अकूत संपत्ति नहीं थी, जिससे उन्हें वारिसदार की आवश्यकता पड़ गई हो. दरअसल, उन्होंने तो हरिराम को दीनदुखियों की सेवा करने वाला उत्तराधिकारी बनाया था. भूखे जनों का पेट भरने और उनके दुःख दूर करने का वरिसदार बनाया था. सदाव्रत-अन्नदान अभियान को उनके न रहने के बाद भी जारी रखने का वारिसदार हरिराम को बनाया था. जलाराम बापा ने हरिराम को वास्तव में कुछ पाने का नहीं वरन दूसरों को देने का उत्तराधिकारी बनाया था.
जलाराम बापा द्वारा हरिराम को अपना वारिस घोषित करने की खबर तेजी से चारों तरफ फ़ैल गई. सभी ने जलाराम बापा के इस फैसले को सराहा. जलाराम बापा के आदेश का पालन करते हुए हरिराम ने उसी क्षण से सेवा कार्यों को ज्ञान की किताबें मान कर अपना लिया. विद्यालय जाना छोड़ दिया. जलाराम बापा के सेवा घर को
ही अपना विद्यालय मान कर पूरी लगन से जुट गया. सदाव्रत-अन्नदान कार्य में सहयोग उसका नियमित अध्ययन सदृश्य बन गया. खाली समय में हरिराम धर्म ग्रंथों को पढने लगा. इस तरह खाली समय का भी सदुपयोग होने लगा. फिर तो हरिराम को प्रभु का प्रसाद ऐसा मिला, वह ह्रदय से श्रीराम का सच्चा भक्त बन गया.
वेद, पुराण, उपनिषद, रामायण, महाभारत, गीता आदि धर्म ग्रन्थ उसे कंठस्थ हो गए. जलाराम बापा
के जीवन आदर्शों को भी उसने आत्मसात कर विचार और व्यवहार में प्रयुक्त करना प्रारम्भ कर दिया था. ( जारी )                  
                        ,                                            

Jalaram bapaa kee jeewan-kathaa ( 30 )

सेवा भावी पत्नी वीर बाई का स्वर्गवास : जलाराम बापा के प्रत्येक सेवा कार्यों में पत्नी वीर बाई का योगदान अनूठा था. सदाव्रत-अन्नदान का अभियान इनके सहयोग के बिना संभव न था. आगंतुक अथितियों की संख्या अधिक होने के बावजूद इन्होने सदैव पूरी तन्मयता और प्रसन्नचित्त होकर रसोई तैयार की. सदाव्रत-अन्नदान का सिलसिला शुरू हुए ५८ वर्ष हो चुके थे, लेकिन वीर बाई का उत्साह पूर्ववत कायम था. उसमें कोई कमी नहीं आई थी.  वे तो साक्षात अन्नपूर्णा देवी सदृश्य थीं. तैयार की हुई रसोई में उनके प्रेम वात्सल्य का भी स्वाद भी समाहित रहता था. जलाराम बापा और पत्नी वीर बाई दोनों का प्रथम उद्देश्य दीनदुखियों की सेवा करना था. प्रभु भक्ति और सेवा कार्यों के कारण वे गृहस्थ होते हुए भी सांसारिक मोह माया से कोसो दूर थे. जलाराम बापा द्वारा अपनी पत्नी वीर बाई को देवी मान कर उनके प्रति हमेशा श्रद्धा भाव रखना अनुयायियों के लिए प्रेरणा जनक था.
एक दिन ऐसा भी आया, जो सबको रूला गया. इस ह्रदय विदारक क्षण की किसी को कल्पना नहीं थी. आगंतुक अथितियों, अनुयायियों, सेवकों और वीरपुर वासियों के लिए इस दिन का सूरज ताप नहीं बल्कि संताप लेकर उगा था. देवी स्वरूप वीर बाई ने बिस्तर पर अपनी अंतिम साँसें लीं. उन्होंने इस मायावी संसार से सदा के लिए अपनी विदाई ले ली. लोगों की आँखों से आंसू नहीं थम रहे थे. रो-रो कर उनका बुरा हाल था. वीरपुर के साथ साथ आसपास के क्षेत्रों में भी यह शोक समाचार वायु वेग से फ़ैल गया था. श्रद्धालु जन वीर बाई के अंतिम दर्शन के लिए वीरपुर उमड़ पड़े थे. हर कोई शोक संतप्त था. शोक में लोगों ने भोजन त्याग दिया था. लेकिन जलाराम बापा अपने प्रभु की इस इच्छा से अवगत थे. जीवन-मृत्यु के गूढ़ रहस्य को वे भलीभांति समझते थे, इसलिए उनकी आँखे नम अवश्य थीं किन्तु उनके चहेरे के भाव को पढ़ना आसान नहीं था. रोकर बेसुध से होने वाले अपने अनुयायियों को जलाराम बापा सांत्वना दे रहे थे.तो किसी को जीवन के सत्य से वाकिफ करा रहे थे. यद्दपि जलाराम बापा को इसका अहसास अवश्य था उनके सेवा यज्ञ में पत्नी वीर बाई की आहुतियाँ अत्यंत लाभकारी थीं, जिसका अभाव अब थोड़ी दिक्कत पैदा करेगा. लेकिन प्रभु के इस कठोर फैसले के समक्ष वे भी विवश थे. वीर बाई जलाराम बापा की केवल जीवन संगिनी ही नहीं थीं, बल्कि उनके सेवा कार्यों में बराबर की सहभागी भी थीं.
वीर बाई के बैकुंठ धाम प्रवास के पश्चात जलाराम बापा ने अपने यहाँ एक सप्ताह तक निरंतर राम धुन के साथ भजन कार्यक्रम जारी रखवाया. वीर बाई को अपने श्रद्धा सुमन अर्पित करने के लिए श्रद्धालु जन इस भजन कार्यक्रम में परिवार सहित शामिल हो रहे थे. "रघुपति राघव राजा राम, पतित पावन सीता राम" गायन के दरम्यान अनुयायियों को इन पंक्तियों में जलाराम बापा और वीर बाई की झलक दृष्टिगोचर हो रही थी. इस तरह
सात दिन तक जलाराम बापा के सानिध्य में भजन की पावन गंगा प्रवाहित होती रही और श्रद्धालु जन भक्ति के निर्मल शीतल जल से अपने तपते शोक संतप्त शरीर तथा अंतर्मन को ठंडक देकर पवित्र करते रहे. ( जारी )                    .                               

शुक्रवार, 30 दिसंबर 2011

Jalaram bapaa kee jeewan-kathaa ( 29 )

कड़बी महिला की खोई नथ नारियल से निकली : जलाराम बापा की पत्नी वीर बाई अपने पति के सेवा कार्यों में सहयोग करने के साथ ही प्रभु भक्ति भी नियमित रूप से करती थीं. रोज रसोई तैयार होने के बाद वे सबसे पहले भगवान् को भोग लगाती थीं, फिर उसके बाद ही अथितियों को भोजन परोसा जाता था. एक दिन वे हमेशा की तरह पूजा पाठ करने के बाद वृद्ध महात्मा से प्राप्त झोली-डंडा के भी दर्शन कर रही थीं, तभी उन्हें उसमें एकाएक साक्षात राधा-कृष्ण के दर्शन हुए. वीर बाई हतप्रभ रह गई. फिर उनकी आँखों से खुशी के आंसू छलक उठे. दोनों हाथ जोड़ कर उन्होंने अपनी कृतज्ञता व्यक्त की. तत्पश्चात वे जब पूजा घर से बाहर वाले कमरे में आयीं तो कड़बी जात की एक
ग्रामीण महिला जो हाथ में एक नारियल रखे हुए थी, उनकी प्रतीक्षा करते हुए मिली. वीर बाई को देखते ही वह कड़बी महिला उनके पैरों में गिर कर रोने लगी. वीर बाई ने उसके सर पर वात्सल्य से हाथ फेरते हुए उसे उठाया. फिर पूछा- "बहन, ऐसे क्यों तुम रो रही हो? कोइ संकट आया हो, कोई दुख हो, तो साफ़ साफ़ बताओ, मेरे प्रभु तुम्हारी सहायता अवश्य करेंगे". अश्रुपूरित नेत्रों के साथ उस महिला ने सकुचाते हुए कहा- "देवी माँ, मैं बहुत परेशान हूँ. यदि आपकी कृपा होगी तो मेरा दुःख दूर हो जाएगा". वीर बाई ने उसे भरोसा दिलाते हुए कहा- "बहन, निःसंकोच अपनी परेशानी बताओ. घबराओ नहीं, तुम्हारा दुःख अवश्य दूर होगा". कड़बी महिला ने अपने आंसू पोछते हुए बताया- "देवी माँ, मैं रूडा पटेल की बहू हूँ. कुछ दिन पहले मैं काना पटेल के लड़के की बारात में गई थी. विवाह के समय आपाधापी में मेरे नाक की नथ गिर कर खो गई. मैंने उसे बहुत ढूंढा लेकिन कहीं न मिली. हो सकता है किसी ने उसे उठाकर खुद रख लिया हो. मेरे पति तो शांत स्वभाव के हैं, लेकिन मेरी सास गुस्सैल है. नथ को लेकर उसने मेरा जीना दूभर कर दिया है. ऐसी स्थिति में जीने से क्या लाभ?, अब आत्महत्या कर लेना ही उचित लग रहा है. इसीलिये अंतिम बार आपका आशीर्वाद लेने आई हूँ, ताकि मेरा परलोक सुधर जाए". वीर बाई ने उसे विनम्रता से समझाते हुए कहा- "बहन, ऐसा बिलकुल नहीं करना. कभी ऐसा आत्मघाती कदम नहीं उठाना. प्रभु की कृपा से हमें यह मानव शरीर मिला है. इसकी रक्षा करना हमारा दायित्व है. इस शरीर के माध्यम से ही हमें अच्छे कार्य करने हैं, फिर इसे नष्ट करने का क्या अर्थ है. तुम धैर्य रखो, तुम्हारा दुख अवश्य दूर हो जाएगा". यह समझाइश देते हुए वीर बाई ने उसे कुछ देर बैठने को कहा. फिर वे उसकी समस्या का समाधान जानने जलाराम बापा के पास गयीं.
जलाराम बापा तब प्रभु भक्ति में ध्यानमग्न बैठे थे. थोड़ी देर बाद जब वे निवृत्त हुए तो वीर बाई ने उन्हें आगंतुक कड़बी महिला की परेशानी का ब्यौरा दिया. उसके द्वारा आत्महत्या करने की मंशा से भी अवगत कराया. यह सुनने के बाद जलाराम बापा ने आँखें बंद कर हाथ जोड़ते हुए प्रभु का स्मरण किया. अगले क्षण वे वीर बाई के साथ उस महिला के पास पहुंचे. जलाराम बापा को देख कर महिला ने नारियल देकर उनके चरण स्पर्श किये और फिर वह रोने लगी. जलाराम बापा ने उसे शांत कराया. तत्पश्चात महिला द्वारा श्रद्धापूर्वक भेंट स्वरुप लाये गए नारियल को उसके सामने ही फोड़ा. नारियल फोड़ते ही चमत्कार हो गया. उस नारियल के भीतर महिला की खोई हुई नथ निकल आई. नारियल के अन्दर से निकली अपनी नथ देख कर वह महिला चौंक गई. पल भर के लिए वह स्तब्ध रह गई. फिर प्रसन्नतावश वह जलाराम बापा के जयकारे लगाने लगी. जलाराम बापा के चमत्कारों के बारे में उसने पहले सुन रखा था. इसलिए उसे यह चमत्कार प्रभु की लीला के सदृश्य लगा. उसने जलाराम बापा के पुनः चरण स्पर्श किये और आभार जताते हुए कहा- "बापा, आपकी लीला अपरम्पार है, आपकी कृपा से मेरा जीवन उजड़ने से बच गया. आपने खोई हुई इस नथ को वापस मुझे दिलवा कर मेरा खोया हुआ सम्मान भी दिलवा दिया है, आपका उपकार मैं कभी नहीं भूल पाउंगी". जलाराम बापा ने मुस्कुराते हुए कहा- "बेटी, यह लीला मेरी नहीं प्रभु की है. दुःख में वह सबकी सुनता है. प्रभु अपने दुखियारे भक्त पर कृपा करते ही हैं. जीवन बचाने वाला भी वही है और सम्मान देने वाला भी. उपकार प्रभु का ही मानो, मैं तो आप लोगों का सेवक मात्र हूँ".
जब वह महिला नथ मिलने की खुशी में जलाराम बापा के जोर से जयकारे लगा रही थी, तब इसे सुन कर वहां आये हुए अन्य अथिति भी एकत्रित हो गए. नथ संबंधी किस्सा और जलाराम बापा का चमत्कार सबको मालूम हुआ.      जलाराम बापा के यहाँ पहली बार आये एक युवक ने जिज्ञासावश उनसे पूछा- "बापा, आप नाराज न हो तो एक बात पूछू?" जलाराम बापा बोले- "नाराजगी कैसी?, पूछो भाई". उस युवक ने कहा- "बापा, यह कैसे हो सकता है? इस महिला की नथ खोई थी कहीं और किन्तु निकली इस नारियल के भीतर से. यह कैसे संभव हुआ?, समझ में नहीं आ रहा है" जलाराम बापा ने अनजान बनते हुए जवाब दिया- "भाई, यह मुझे भी समझ में नहीं आ रहा है, तो फिर तुझे कैसे समझाऊं". वह युवक निरूत्तर होकर जलाराम बापा का मुंह ताकने लगा. लेकिन वहां मौजूद पुराने अनुयायी जलाराम बापा के इस चमत्कार को समझ रहे थे.
उधर, वह कड़बी महिला ने जलाराम बापा के इस चमत्कार से प्रभावित होकर मन बना लिया अब अपने गाँव वापस नहीं जायेगी और जलाराम बापा के यहाँ रह कर सेवा कार्य में सहयोग करेगी. उसने वीर बाई से कहा- "देवी माँ, अब इस गृहस्थ संसार से मेरा मोह भंग हो गया है, मैं यहीं रह कर सेवा और प्रभु भक्ति करना चाहती हूँ, आप आज्ञा दें".वीर बाई ने उसे समझाया- "नहीं बहन, ऐसा न सोचो. गृहस्थ संसार में रहते हुए पति की सेवा करना ही प्रभु भक्ति के समान है. तुम प्रसन्नचित्त होकर अपने घर जाओ और परिवार का ध्यान रखो". फिर वह महिला वीर बाई के आदेश का आदर करते हुए अपने गाँव के लिए प्रस्थान कर गई. (जारी )           .      .        .                        
                                                               

रविवार, 25 दिसंबर 2011

Jalaram bapaa kee jeewan-kathaa ( 28 )

डूबता जहाज पार लगाया : उन दिनों सौराष्ट्र का सागर तटीय क्षेत्र गुजरात का प्रसिद्द अंतर्देशीय व्यापारिक इलाका माना जाता था. सौराष्ट्र के बंदरगाहों का व्यापारिक वर्चस्व था. जोडीया पोर्ट भी इनमें से एक था. यहाँ अमरचंद नामक एक शेठ रहता था. साहसिक सामुद्रिक व्यापारी के रूप में उसकी ख्याति थी. समीपवर्ती खाड़ी देशों में वह पानी जहाज के जरिये मौसमी वस्तुओं का व्यापार करता था.
एक बार अमरचंद पानी जहाज में मौसमी माल भर कर अपने कुछ कर्मचारियों के साथ बसरा के लिए निकल पडा. वहां उसने सारा माल बेच कर अच्छा मुनाफा कमाया. वापसी के वक़्त उस रकम के एवज में उसने बसरा से विभिन्न मसाले खरीदे. मसालों से लदा जहाज जोडीया पोर्ट की तरफ आ रहा था. कई दिनों के सामुद्रिक सफ़र के बाद सबके मन में परिजनों से मिलने की तीव्र उत्कंठा थी. समुद्र की हवाओं के खुशनुमा थपेड़े और समुद्री परिंदों के कलरव से शेठ अमरचंद सहित सबका मन प्रफ्फुल्लित था. किन्तु कुदरत कुछ और ही मंजूर था. जोडीया पोर्ट अभी भी दस मील दूर था. तभी अचानक हवाओं का रूख बदल गया. अगले ही क्षण खुशनुमा थपेड़े जानलेवा तूफ़ान में बदल गए. समुद्र में तेज लहरें उठने लगीं. जहाज डोलने लगा. सबका कलेजा काँप उठा. मौत का मंजर दिखने लगा. शेठ अमरचंद के आदेश पर सभी कर्मचारी सुरक्षा की तैयारियों में जुट गए.
इसी बीच जहाज के पिछले हिस्से में छिद्र हो गया, जिससे जहाज में पानी भरना शुरू हो गया. जान बचने की जो थोड़ी उम्मीद थी वह भी हवा हो गई. सब अपने अपने इष्ट देव को याद करने लगे. सामुद्रिक सफ़र में शेठ अमरचंद की उम्र बीतने को आई थी. कई झंझावातों को उसने साहसपूर्वक झेला था लेकिन इस तरह मौत सामने कभी नहीं मंडराई थी. किनारे आकर जहाज डूबेगा, इसका अंदेशा उसे सपने में भी कभी न हुआ था. दरिया देव की प्रार्थना भी असर नहीं दिखा रही थी. अब उसे लग रहा था कोई चमत्कार ही सबकी जान बचा सकता है. चमत्कार की बात जेहन में आते ही उसकी आँखें एकाएक चमक उठी. उसने कई लोगों के मुंह से वीरपुर के भक्त जलाराम बापा के विषय में चमत्कारिक घटनाएं सुनी थीं. यह भी सुना था यदि श्रद्धापूर्वक भक्त जलाराम बापा को याद कर कोई मन्नत माँगी जाय तो वह अवश्य पूरी होती है, चाहे बड़े से बड़ा संकट क्यों न आये, मन्नत मांगते ही वह संकट चमत्कारिक रूप से दूर हो जाता है. शेठ अमरचंद ने बगैर कोई देर किये हाथ जोड़ कर जलाराम बापा का स्मरण करते हुए मन्नत मानी- "हे जलाराम बापा, संतों के संत, दीनदुखियों के तारणहार, आज तक मैं केवल धन्धेपानी में ही डूबा रहा, आपके दर्शन कर चरण स्पर्श का सौभाग्य प्राप्त न कर सका, वीरपुर आने का समय न निकाल सका, शायद इसीलिये दंड स्वरुप आज मेरे जीवन की नैय्या डूब रही है. मजबूरी में अब आपके प्रति श्रद्धा भाव जागृत हुआ है, अतः क्षमा चाहता हूँ. आप तो सबकी रक्षा करते हैं, हमारी जान भी अब आपके हवाले है. बापा, हमारा यह डूबता जहाज यदि सकुशल किनारे पहुँच जाएगा तो मैं वीरपुर आकर सदाव्रत-अन्नदान कार्य के लिए चालीस बोरी पतला चावल भेंट करूंगा". शेठ अमरचंद आँख बंद कर जलाराम बापा की प्रार्थना करता रहा. अगले ही पल चमत्कार सा हो गया. मौसम का मिजाज अचानक सकारात्मक हो गया. देखते ही देखते स्थिति सामान्य हो गई. तेज तूफानी हवाएं थम गई, जहाज में हुए छिद्र से पानी घुसना बंद हो गया. शेठ अमरचंद द्वारा जलाराम बापा को याद कर मानी गई मन्नत का सुपरिणाम दिखने लगा. प्राणों का संकट टलता देख कर सबने चैन की सांस ली. सबके कलेजे को ठंडक पहुँची. मौत के मुंह से वापस सुरक्षित लौटने पर शेठ अमरचंद ने हाथ जोड़ कर जलाराम बापा को धन्यवाद दिया. उनके कर्मचारियों को भी तब तक जलाराम बापा की मन्नत मानने के बारे में ज्ञात हो चुका था, इसलिए उन्होंने भी मन्नत के फलीभूत होने पर जलाराम बापा के प्रति कृतज्ञता जताई.
उधर, सागर तट पर शेठ अमरचंद और उनके कर्मचारियों के परिवार वाले जहाज के किनारे लगने की प्रतीक्षा में चिंतातुर होकर खड़े थे. जैसे ही जहाज सकुशल किनारे लगा सब खुशी से उछल पड़े. जहाज से उतर कर शेठ अमरचंद और उनके कर्मचारी हर्षोल्लास के साथ परिजनों से गले मिले. आज नया जीवन मिलने पर उनकी खुशी  
दुगनी थी. परिजनों को भी सारा घटनाक्रम मालूम होने पर सुखद आश्चर्य हुआ. फिर सबने जलाराम बापा के जयकारे लगाए. शेठ अमरचंद द्वारा लाया गया सारा सामान जहाज से उतार कर कर्मचारियों ने गोदाम में पहुंचा दिया. सब लोग बस्ती पहुंचे. सकुशल वापसी होने की खुशी में रात को जश्न मनाया गया. पूरी बस्ती में जलाराम बापा की चमत्कारिक शक्ति की चर्चा होने लगी. मन्नत के फलने पर लोगो में जलाराम बापा के प्रति श्रद्धा
और भी बढ़ गई.
पुरानी आदत से लाचार शेठ अमरचंद दूसरे दिन ही जलाराम बापा की मन्नत विषयक दायित्व को भूल कर पहले की तरह धन्धेपानी में डूब गया. मन्नत फलीभूत होने के एवज में  चालीस बोरी पतला अनाज जलाराम बापा के सदाव्रत-अन्नदान कार्य हेतु वीरपुर भेजने में वह टालमटोल करने लगा. मौत का संकट झेल चुके कर्मचारियों द्वारा जब उसे इस सन्दर्भ में याद दिलाया जाता तो वह लापरवाही पूर्वक कहता- "चावल भेज देंगे, ऐसी भी क्या जल्दी है. कहाँ उनका चावल भागा जा रहा है". शेठ का यह स्वार्थी और अशिष्ट जवाब सुन कर कर्मचारी हैरान होकर चुप रह जाते. दिन गुजरते रहे. लेकिन शेठ अमरचंद को सदबुद्धि नहीं आई. "काम निकल गया, पहचानते नहीं" की तर्ज पर शेठ अमरचंद के नकारात्मक रवैये की आलोचना पूरी बस्ती में होने लगी. एक दिन उनके धर्म भीरू  मुनीम ने शेठ को खरी खरी सुनाते हुए कहा- "शेठ जी, आप यह अच्छा नहीं कर रहे हैं. पूरी बस्ती आपका मखौल उड़ा रही है". शेठ अमरचंद अपनी गद्दी पर लेट कर आराम फरमा रहा था. उसने उत्सुकतावश पूछा- "क्यों, मैंने ऐसा कौन सा गुनाह कर दिया है जो बस्ती वालों को तकलीफ हो रही है". मुनीम ने प्रत्युत्तर दिया- "हाँ, आपने वचन न निभाने का गुनाह किया है. बस्ती वालों का मानना है आप वचन के पक्के नहीं हैं". शेठ ने झल्लाते हुए कहा- "कौन सा वचन, मैंने कब, किसको, कैसा वचन दिया है, साफ़ साफ़ बताओ". मुनीम ने याद दिलाते हुए कहा- "शेठ जी, आप शायद भूल गए हैं या फिर भूलने का अभिनय कर रहे हैं. याद करिए, बसरा से लौटते समय जब आपके  जहाज के डूबने की नौबत आ गई थी तब आपने प्राणों की रक्षा के लिए जलाराम बापा को याद कर सकुशल घर पहुचने की मन्नत माँगी थी. मन्नत फलने पर आपने वीरपुर चालीस बोरी पतला चावल भेजने का प्रण किया था. इतने दिन गुजरने के बाद भी आपने अपना वचन नहीं निभाया है, यह गुनाह नहीं तो और क्या है". यह सच बात सुन कर भी शेठ को न आत्मग्लानी और न ही पश्चाताप. उसने अहसान के अंदाज में कहा- "मैं इससे कब इनकार कर रहा हूँ. बस्ती वालों को बोलने का मौक़ा चाहिए, तुम उनकी बातों पर कान मत लगाओ. वीरपुर चावल ही तो भेजना है न, कल जाकर चालीस बोरी मोटा चावल भगत के यहाँ पटक आओ". मुनीम को शेठ की यह बात अच्छी नहीं लगी. ऐसी उम्मीद उससे न थी. मुनीम ने शेठ को टोकते हुए कहा- "किन्तु शेठ जी, आपने तो पतला चावल देने का प्रण किया था तो फिर चालीस बोरी मोटा चावल ले जाने को क्यों कह रहे हैं". शेठ ने उपहास पूर्वक जवाब दिया- "भूखे लोगों के लिए क्या पतला क्या मोटा चावल, पेट भरने से मतलब होना चाहिए. मैं जो कह रहा हूँ वह करो".
दूसरे दिन भोर होते ही शेठ के आदेशानुसार मुनीम चालीस बोरी मोटा चावल बैलगाड़ी में डलवा कर वीरपुर रवाना हो गया. छः दिन बाद जब मुनीम वीरपुर पहुंचा तब जलाराम बापा प्रभु भक्ति में ध्यानमग्न थे. जलाराम बापा के चरण स्पर्श करने के बाद उसने अपना परिचय देते हुए कहा- "बापा, शेठ अमरचंद ने मुझे भेजा है". जलाराम बापा ने मुस्कुराते हुए कहा- "भाई, जोडीया से सदाव्रत के लिए चावल लेकर आये हो, अच्छी बात है, रखवा दो".यह वाक्य सुन कर मुनीम हतप्रभ रह गया. उसने जलाराम बापा को अभी तो पूरी बात बताई ही नहीं थी, फिर उन्हें आने का मकसद कैसे मालूम हो गया. उसकी हैरानी भांपते हुए जलाराम बापा ने कहा- "भाई, परेशान न हो, इतने दूर से आये हो, बैल थक गए होंगे और तुम भी. बैलों को गाडी से अलग कर छाँव में लाकर उन्हें चारा पानी दे दो और तुम भी प्रभु के दर्शन कर भोजन कर लो". जलाराम बापा ने तत्काल सेवकों को बुला कर बैलों और मुनीम की सेवा करने का आदेश दिया. मुनीम ने जलाराम बापा को शेठ का पत्र देते हुए कहा- "बापा, शेठ जी ने आपको राम राम कहा है". स्वीकारोक्ति स्वरुप उन्होंने भी कहा- "राम राम".
रात रूकने के बाद अगले दिन सुबह मुनीम ने जलाराम बापा से वापस जोडीया लौटने की आज्ञा माँगी तो जलाराम बापा बोले- "भाई, इतनी दूर से आये हो, अभी तो थकान भी नहीं उतरी होगी, दो चार दिन और यही आराम करो ,फिर भले चले जाना ".जलाराम बापा के आग्रह का आदर करते हुए मुनीम रूक गया. पांचवें दिन वापसी के समय जलाराम बापा ने मुनीम की बैलगाड़ी में रास्ते के लिए खराब न होने वाला सूखा भोजन और पीने का पानी रखवा दिया. रवाना होते समय मुनीम ने जलाराम बापा के चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लिया फिर हाथ जोड़ कर कहा- "बापा, आथित्य सत्कार के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद. मेरे शेठ के लिए कोई जवाबी चिट्ठी देना हो तो दे दीजिये". जलाराम बापा ने कहा- "नहीं भाई, चिट्ठी तो नहीं देना है. हाँ, यह सन्देश अवश्य दे देना सेवा कार्य में प्रत्येक सहायता मायने रखती है, इसलिए अफ़सोस नहीं करना. यह भी कहना जब उनके जहाज में छिद्र हो गया था और पानी घुस रहा था तब बहाव में मेरा कुर्ता आकर छिद्र में फंस गया था, उसे निकाल कर किसी जरूरतमंद भाई को भेंट कर देंगे". यह सुन कर मुनीम सकपका गया. अपने शेठ की नासमझी पर उसे क्रोध आने लगा. जलाराम बापा उसके अंतर्द्वंद को समझ गए और कहा- "भाई, दुखी न हो, शांत रहो, प्रभु आपका सफ़र सुखद रखेगा. प्रेम से जोडीया जाओ". मुनीम जलाराम बापा से आशीर्वाद लेकर विदा हो गया.
जोडीया पहुँच कर मुनीम सीधे शेठ के पास जाकर जलाराम बापा का सन्देश सुनाया. मुनीम की बैलगाड़ी आती देख आसपास के लोग भी उत्सुकतावश एकत्रित हो गए. जलाराम बापा का सन्देश सुन कर शेठ अमरचंद एक पल के लिए जडवत सा हो गया. वह उसी क्षण सागर तीरे अपने जहाज की तरफ दौड़ा. जिज्ञासावश मुनीम सहित बस्ती वाले भी शेठ के पीछे पीछे दौड़े. जहाज के पास पहुँच कर शेठ ने मुआयना किया तो देखा जहाज के पिछले हिस्से में बने छिद्र में एक कपड़ा फंसा हुआ था. उसे निकाल कर देखा तो वह सचमुच जलाराम बापा का कुर्ता था. आश्चर्य से शेठ की आँखें फटी रह गई. कुरते की जेब से जलाराम बापा की दांत-खोद्रनी भी निकली. यह सब देख कर लोग चौक गए. शेठ आत्मग्लानी से पीड़ित हो गया. उसे पश्चाताप होने लगा. सर पर दोनों हाथ रख कर वह वहीं बैठ गया और जोर जोर से रोने लगा. वह रोते हुए कहने लगा- "हे बापा, मुझे क्षमा करना, इस नादाँ से बहुत बड़ी भूल हुई है. आपने मेरी और मेरे कर्मचारियों के जीवन की रक्षा की और मैं आपको सही अर्थ में समझ नहीं पाया". बस्ती वालों ने उसे शांत कराया और घर लेकर आये.
शेठ अमरचंद ने तत्काल बैलगाड़ी में चालीस बोरी पतला चावल डलवाया, जलाराम बापा का कुर्ता झोले में रखा.  फिर पत्नी और मुनीम को साथ लेकर वीरपुर के लिए रवाना हो गया. वीरपुर पहुचने पर शेठ जलाराम बापा के पैरों में गिर कर खूब रोया. जलाराम बापा के कहने के बावजूद वह उठने को तैयार नहीं था. काफी समझाने के बाद शेठ खडा हुआ और दोनों कान पकड़ कर माफी माँगने लगा. उसके सर पर हाथ फेरते हुए जलाराम बापा ने आशीर्वाद देकर कहा- "भाई, जब जागो तब सवेरा. दुखी न हो. प्रभु समय आने पर सब बिगड़ी बात बना देता है. प्रसन्न होकर
जोडीया जाओ और दीनदुखियों की सेवा सच्चे मन से करो, उन्हीं में तुम्हें प्रभु के दर्शन होंगे". शेठ की पत्नी और मुनीम ने भी जलाराम बापा के चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लिया तत्पश्चात वे सभी जोडीया के लिए प्रस्थान किये. ( जारी )                                                                                                       .                                                           . .                                                                
   

शनिवार, 24 दिसंबर 2011

Jalaram bapaa kee jeewan-kathaa ( 27 )

जलाराम बापा के आशीर्वाद से वंश वृद्धि : जलाराम बापा के स्मरण मात्र से आस्थावानों के संकट दूर होने लगे थे. और यदि किसी अनुयायी को उनका साक्षात आशीर्वाद मिल जाता तो उसकी प्रसन्नता की सीमा नहीं रहती थी. उसकी अप्रत्याशित अभिलाषा चमत्कारिक रूप से फलीभूत होती थी. खम्भारिया गाँव के निवासी गागा पटेल भी ऐसे सौभाग्यशाली अनुयायियों में से एक थे. गहरे शोक के आघात के बाद जलाराम बापा के आशीर्वाद मिलने के
पश्चात उन्हें खुशियाँ वापस प्राप्त होने का अहसास हुआ.
हुआ यूं, एक दिन अनुयायी गागा पटेल का एकलौता युवा पुत्र जयराम की तेज बुखार के कारण एकाएक मृत्यु हो गई. पिताश्री गागा पटेल सहित परिजनों के लिए यह बहुत बड़ा सदमा था. गागा पटेल के वंश का चिराग ही बुझ गया. परिवार में प्रचंड शोक का वातावरण सर्जित हो गया. गागा पटेल आर्थिक रूप से संपन्न थे. हर सुख सुविधा उन्हें उपलब्ध थी. बड़ा घर, अच्छी खेती बाडी और बीस गाय-भैंस वैभव को जाहिर करते थे. लेकिन एकलौते युवा पुत्र के निधन से वे स्वयं को असहाय और निर्धन महसूस कर रहे थे. बलिष्ठ और सुन्दर शरीर होने के बावजूद वे पुत्र की मौत के गम से मानसिक तौर पर टूट गए. पुत्र-शोक के कारण उनका सब कामकाज ठप हो गया था. पुत्र के अंतिम संस्कार की सभी विधियां संपन्न हो चुकी थी. अभी भी वे इस गहरे सदमे से उबर नहीं पा रहे थे.
गागा पटेल जलाराम बापा के भक्त थे. वे हमेशा जलाराम बापा के संपर्क में रहते थे. जब भी अवसर मिलता वे जलाराम बापा का आशीर्वाद लेने वीरपुर पहुँच जाते थे. उधर, जलाराम बापा को भी अपने अनुयायी गागा पटेल के पुत्र के देहावसान का दुखद सन्देश कुछ दिनों बाद मिला तो वे सांत्वना देने तत्काल बैलगाड़ी से खम्भारिया गाँव के लिए रवाना हो गए. इनके साथ गागा पटेल के वीरपुर निवासी चार रिश्तेदार भी चल पड़े. जब रात को जलाराम बापा गागा पटेल के घर पहुंचे तब उन्हें देख कर गागा पटेल धारोधार रोने लगे. जलाराम बापा के पैरों में गिर कर वे अपना असहनीय दुःख व्यक्त करने लगे. उन्होंने कहा- "बापा, मेरा सब कुछ लुट गया. मेरा एक का एक जवान बेटा मुझे सदा के लिए छोड़ कर इस संसार से चला गया. मेरे वंश का दीपक बुझ गया. पूरे परिवार के सपने बिखर गए". जलाराम बापा ने उन्हें अपने पास बैठाया और सांत्वना देते हुए समझाया- "गागा भाई, हिम्मत रखो. परिवार का मुखिया ही यदि टूट जाएगा तो बाकी लोगों का ध्यान कौन रखेगा. जो होना था हो गया. यही विधि का विधान है. प्रभु की मर्जी के आगे किसकी चली है. जीवन मृत्यु पर हमारा कोई वश नहीं है. प्रभु के इस कठोर निर्णय के पीछे उनका कोई गूढ़ अभिप्राय अवश्य होगा".गागा पटेल अपने शोक और संवेदनाओं पर नियंत्रण नहीं रख पा रहे थे. उन्होंने रोते हुए कहा- "बापा, एकलौते बेटे के बिना मेरी पूरी जिन्दगी कैसे कटेगी? वंश कैसे आगे बढेगा?" जलाराम
बापा इस गंभीर सवाल को सुनने के बाद थोड़ी देर के लिए मौन धारण कर लिया. आँखें बंद कर प्रभु का स्मरण करने लगे. मानो अपने प्रभु श्रीराम के साथ कोई विचार विमर्श कर रहे हों.
कुछ देर बाद जलाराम बापा ने आँखें खोली. गागा पटेल से उन्होंने कहा- "गागा भाई, राम धुन प्रारंभ करवाइए, मन हल्का हो जाएगा". जलाराम बापा के आदेश का आदर करते हुए तुरंत भजन बैठक जम गई, आसपास के श्रद्धालु जन भी एकत्रित हो गए. फिर तो देर रात तक राम धुन का दौर चलता रहा. भोर होते ही जलाराम बापा ने वापस वीरपुर लौटने की इच्छा जताई. जब जलाराम बापा जाने लगे तब गागा पटेल उनके पैरों में गिर कर फिर रोने लगे.
जलाराम बापा ने उस समय आशीर्वाद देते हुए केवल इतना ही कहा- "गागा भाई, अब शोक नहीं करना. प्रभु सभी सपने पूर्ण करेंगे".
जलाराम बापा के चले जाने के बाद भी गागा पटेल पुत्र शोक डूबे रहे. जलाराम बापा का यह गूढ़ आश्वासन "प्रभु सभी सपने पूर्ण करेंगे" गागा पटेल को विचलित कर रहा था. इसके मायने उन्हें समझ से परे लग रहे थे. लेकिन दूसरी ओर जलाराम बापा के आशीर्वाद और आश्वासन पर पूरा भरोसा भी था. वंश वृद्धि की चिंता ने रात को उनकी नींद का हरण कर लिया. रात भर वे बिस्तर पर करवटें बदलते, आंसू बहाते रहे. सुबह होते ही गागा पटेल की पत्नी प्रसन्न भाव से उनके खटिये में आकर बैठ गई और पैर दबाने लगी. गागा पटेल ने पत्नी की प्रसन्न मुख मुद्रा देख कर विस्मय से पूछा- "क्या बात है, आज तुम ज्यादा ही खुश नजर आ रही हो?". उसने चहकते हुए जवाब दिया- "जयराम के बापूजी, सचमुच खुश होने वाली बात है. जलाराम बापा का दिया आशीर्वाद फल गया समझिये".गागा पटेल फुर्ती से उठ कर बैठ गए और पूछा- "जलाराम बापा का आशीर्वाद, समझा नहीं, साफ़ साफ़ बताओ क्या कहना चाहती हो".उसने खुलासा करते हुए कहा- "जयराम की पत्नी यानी हमारी बहू गर्भवती है". गागा पटेल यह खुशखबरी सुन कर चौंक गए और कहा- "सचमुच!". वे खटिये से खड़े हो गए और खुशी के मारे नाचने लगे. जलाराम बापा के गूढ़ आश्वासन का अर्थ अब उन्हें समझ में आया. पूजा घर में प्रभु श्रीराम की छवि के सामने जाकर हाथ जोड़ कर उन्होंने कहा- "हे प्रभु, आपने मेरी लाज रख ली, मेरा वंश बचा लिया, खुशियाँ लौटा दीं, आपकी लीला अपरम्पार है". तत्पश्चात जलाराम बापा का स्मरण कर आशीर्वाद के लिए उनका भी आभार जताया.
इस खुशखबरी से गागा पटेल के जीवन में पुनः उत्साह का संचार हो गया. उसका आत्मविश्वास फिर से जागृत हो गया. शरीर में पहले जैसी फुर्ती फिर लौट आई. वंश वृद्धि के सपनों को पंख लग गए.
नौ माह बाद जयराम की पत्नी ने एक सुन्दर शिशु को जन्म दिया. गागा पटेल के घर हर्षोल्लास छा गया, जश्न का वातावरण बन गया. पूरे मोहल्ले में मिठाई बांटी गई. समाज वालों को दावत दी गई. रात को भजन मंडली ने भक्ति रस से सबको आनंदित किया. नवजात शिशु का नाम रखा गया "डायो". जब डायो तीन माह का हुआ तब गागा पटेल परिजनों के साथ उसे लेकर जलाराम बापा के यहाँ वीरपुर गए. जलाराम बापा के यहाँ पहुँचते ही गागा पटेल ने सर्वप्रथम उनके चरण स्पर्श किये फिर शिशु डायो को उनके चरणों में रख कर आशीर्वाद लिया. गागा पटेल ने जलाराम बापा से आभार जताते हुए कहा- "बापा, आपके आशीर्वाद ने मेरा वंश समृद्ध कर दिया है. परिवार में फिर से खुशियाँ आ गई हैं, मेरा पूरा परिवार आपका जीवन भर आभारी रहेगा". जलाराम बापा ने कहा- "गागा भाई, यह भी प्रभु की मर्जी से ही संभव हुआ है. वह एक हाथ से लेता है तो दूसरे हाथ से देता भी है. जीवन का चक्र ऐसे ही चलता है. प्रभु पर सदा विश्वास रखना. प्रसन्नता प्राप्त होती रहेंगी". फिर जलाराम बापा ने सबको प्रेम से भोजन करवाया. गागा पटेल ने सदाव्रत-अन्नदान के लिए भेंट स्वरुप अनाज की बीस बोरियां देकर परिवार समेत विदा हो गए. ( जारी )
                                                                                                                
          

शुक्रवार, 23 दिसंबर 2011

Jalaram bapaa kee jeewan-kathaa ( 26 )

मृत युवा शिष्य मंगू में प्राण लौटाए : जलाराम बापा के प्रति लोगों की श्रद्धा बढ़ती ही जा रही थी. श्रद्धालु उन्हें भगवान का दूत मानने लगे थे. उनके गाँव वीरपुर में कालिदास नामक एक अनुयायी भी था. एक दिन उनके घर एक ज्योतिष जोशी महाराज आये. कालिदास ने उत्सुकतावश उन्हें अपने दस वर्षीय पुत्र मंगू का भविष्य बताने का आग्रह किया. ज्योतिष ने मंगू की हस्त रेखा देख कर भविष्यवाणी की "दस साल बाद यानी जब इस लड़के की आयु बीस वर्ष की होगी तो इसके जीवन को खतरा होगा. हाँ, यदि किसी महान परोपकारी संत की कृपा होगी तो ही इसके जीवन की रक्षा होगी".ज्योतिष की यह भविष्यवाणी सुन कर कालिदास और उसका परिवार सन्न रह गया. उस ज्योतिष जोशी महाराज को दक्षिणा देकर विदा किया गया.
कालिदास दिन भर उस ज्योतिष की भविष्यवाणी के कारण मायूस रहे. दूसरे दिन सुबह पूजा पाठ के पश्चात उन्हें एकाएक जलाराम बापा की याद आई. "यदि किसी महान परोपकारी संत की कृपा होगी तो ही उसके पुत्र के जीवन की रक्षा होगी" ज्योतिष की इस भविष्यवाणी के मद्देनजर कालिदास को जलाराम बापा ही उपयुक्त लगे. जलाराम बापा की शरण में जाना उचित समझा. वे तत्काल अपने पुत्र मंगू को लेकर जलाराम बापा के यहाँ पहुँच गए. लेकिन तय यह किया ज्योतिष की भविष्यवाणी का कोई जिक्र नहीं करेंगे. अपने अनुयायी कालिदास को देख कर जलाराम बापा ने उसका आथित्य सत्कार किया फिर पूछा- "भाई, मेरे योग्य कोई और सेवा हो तो बताओ". कालिदास ने सकुचाते हुए हाथ जोड़ कर कहा- "बापा, यह मेरा एकलौता बेटा मंगू है, आप इसे कंठी बाँध कर अपना शिष्य बना लीजिये. आप इसके गुरू बन जायेंगे तो इसका जीवन धन्य हो जाएगा". फिर उन्होंने अपने पुत्र को आदेश दिया- "बेटा मंगू इधर आ, अपने गुरूदेव के पैर छूकर आशीर्वाद ले". मंगू ने फुर्ती से जलाराम बापा के चरण स्पर्श किये. जलाराम बापा ने उसे आशीर्वाद दिया. तत्पश्चात कालिदास से कहा- "भाई, मैं तो प्रभु का एक सामान्य सा भक्त हूँ, आप लोगों का एक छोटा सेवक हूँ, कोई सिद्ध योगी संत महात्मा नहीं हूँ, जो तुम्हारे बेटे को कंठी बाँध कर उसका गुरू बन सकूं. मैं इस योग्य नहीं हूँ , इसके लिए मुझे क्षमा करिए". जलाराम बापा द्वारा इनकार किये जाने से कालिदास की मायूसी और बढ़ गई. उन्होंने निराशा भरी नज़रों से पास में बैठे जलाराम बापा के एक विशेष अथिति तेजस्वी महात्मा की ओर देखा. यह पूरा वार्तालाप वे भी सुन रहे थे. कालिदास की निराशाजनक किन्तु आग्रहयुक्त नज़रों को वे भांप गए. तेजस्वी महात्मा ने जलाराम बापा से विनम्रता पूर्वक कहा- "भगत, संकोच मत करो. इश्वर का नाम लेकर इस बच्चे को कंठी बाँध दो और अपना चेला बना लो". जलाराम बापा तेजस्वी महात्मा की बात नहीं काट सके. उनके आदेश का सम्मान करते हुए कालिदास के पुत्र मंगू को कंठी बाँध दी, तत्पश्चात उसे सत्य और सेवा के मार्ग पर चलने की सीख देते हुए आशीर्वाद दिया. मंगू ने पुनः जलाराम बापा के चरण स्पर्श किये. कालिदास अत्यंत प्रसन्न हो गए. उन्होंने जलाराम बापा से निवेदन किया- "बापा, अबसे मेरे बेटे का जीवन आपके हवाले है, इसकी रक्षा आप पर निर्भर है".जलाराम बाप ने जवाब दिया- "भाई, जीवन की रक्षा करने वाला एकमात्र प्रभु है. मेरा आशीर्वाद है प्रभु अवश्य रक्षा करेगा. घोर संकट के समय कोई सहायता की आवश्यकता हो तो इस सेवक को बुलाना, मैं उपस्थित हो जाउंगा". कालिदास हर्षित होकर अपने बेटे मंगू के साथ घर की तरफ चल पडा.
कालिदास और उसके परिवार वालों की चिंता अब समाप्त हो गई थी. अब वे चैन की नींद लेने लगे थे. वक्त बीतता गया. बेटे मंगू की उम्र बढ़ने लगी. गुणवान, सज्जन होने के साथ ही कामकाज में भी वह निपुण हो गया था. लोग उसकी तारीफ़ करने लगे. सोलह बरस पूरे होते ही उसके लिए रिश्ते आने शुरू हो गए. लेकिन पिताश्री कालिदास बेटे के लिए अच्छे रिश्ते आने पर भी साफ़ इनकार कर देते. मन में ज्योतिष की भविष्यवाणी का खटका तो था ही. उनकी इच्छा थी बेटे की आयु बीस वर्ष पूर्ण होने के बाद ही उसका विवाह करूंगा, अन्यथा क्यों किसी लडकी का जीवन भी बर्बाद हो".
अब मंगू ने १९ वसंत देख लिए थे. १९ वर्ष तक इस युवक की काया निरोगी थी. उसे किसी तरह की बीमारी ने नहीं जकड़ा था. लेकिन जैसे ही मंगू ने बीसवें वर्ष में प्रवेश किया, उसे पेट में दर्द होना शुरू हो गया. वह पेट की पीड़ा से परेशान रहने लगा. एक दिन ऐसा भी आया, जब पेट का दर्द बढ़ कर उसके लिए असहनीय हो गया. तुरंत वैद्य, हकीम बुलाये गए. सभी प्रकार का उपचार करा कर देख लिया गया, किन्तु कोई फ़ायदा नहीं हुआ. पेट की पीड़ा बढ़ती ही गई. वह छटपटाता रहा. कुछ देर बाद युवक मंगू ने अपनी आँखें सदा के लिए मूँद ली. घर में शोक का वातावरण छा गया. माता, पिताश्री और परिजनों के आंसू नहीं थम रहे थे. तब तक पड़ोसी और गाँव के परिचित जन भी शोक जताने एकत्रित हो गए. पड़ोसी कालिदास को सान्तवना देने लगे.
शोक संतप्त कालिदास को एकाएक उस ज्योतिष जोशी महाराज की भविष्यवाणी याद आ गई, जो सच सिद्ध हुई. इसके साथ ही जलाराम बापा भी याद आये. जलाराम बापा द्वारा बेटे को कंठी बांधने के बाद कहे गए यह शब्द कालिदास के कान में गूंजने लगे- "घोर संकट के समय कोई सहायता की आवश्यकता हो तो इस सेवक को बुलाना, मैं उपस्थित हो जाउंगा". कालिदास ने अपनी धोती से आँखें पोछी. समीप बैठे चचेरे भाई शामजी से उन्होंने कहा- "शामजी भाई, आप तुरंत जलाराम बापा के यहाँ जाकर उन्हें यह सूचना दीजिये "आपने जिसे कंठी बाँध कर शिष्य बनाया है, वह सेवक अंतिम यात्रा के लिए जा रहा है". शामजी तत्काल रवाना हो गए. जलाराम बापा के यहाँ पहुँच कर शामजी ने उन्हें कालिदास का सन्देश देते हुए सारा वृत्तांत सुनाया. यह सुन कर जलाराम बापा बोले- "क्या बात कर रहे हो भाई, ऐसा कैसे हो सकता है?, चलिए, मैं भी आपके साथ चलता हूँ". बिना देर किये जलाराम बापा शामजी के साथ कालिदास के घर की ओर चल पड़े.
दस मिनट बाद जलाराम बापा कालिदास के घर पहुँच गए. बाहर शोक जताने वालों की भीड़ लगी थी. घर के भीतर
महिलाओं का रूदन जारी था. कालिदास के एकलौते युवा पुत्र मंगू की अर्थी तैयार थी. जलाराम बापा को देखते ही
कालिदास रोते हुए उनके पैरों में गिर पड़े और कहा- "बापा, मैं कहीं का नहीं रहा. मेरा सब कुछ लुट गया. मेरा एकलौता जवान बेटा देखते ही देखते मुझसे दूर चला गया. भगवान् को बुलाना था तो मुझे बुला लिया होता".
जलाराम बापा ने उसे सान्तवना देते उठाया और कहा- "हिम्मत रखो भाई, एक बार मुझे अपने शिष्य मंगू का मुंह तो दिखा दो. जलाराम बापा की इच्छा का आदर करते हुए अर्थी पर लिटाये हुए मंगू के शव से उपरी हिस्से का कफ़न हटा दिया गया. अंतिम संस्कार की विधि में दक्ष समाज के एक बुजुर्ग ने मंगू के मुंह से कफ़न हटाते हुए कहा- "लीजिये बापा, अपने जवान शिष्य का मुंह अंतिम बार देख लीजिये". जलाराम बापा अर्थी के पास बैठ गए. मंगू के शव पर स्नेहपूर्वक हाथ फेरा और कहा- "मंगू, मेरे प्यारे शिष्य, अभी और कितनी देर तुझे नींद लेनी है, ज़रा आँख खोल कर मेरी ओर देख". जलाराम बापा के इतना कहते ही चमत्कार हो गया. अगले ही क्षण मंगू की आँख खुल गई. वह एकटक जलाराम बापा की तरफ देखने लगा. जलाराम बापा राम राम जपते हुए मुस्कुराए. उन्होंने कहा- "मंगू, मेरे प्यारे शिष्य, खड़े हो जा, तुझे अभी सेवा के बहुत कार्य करने शेष हैं".मंगू के शरीर में हलचल होने लगी. यह अजूबा देख कर कालिदास सहित सभी उपस्थित जन आश्चर्यचकित रह गए. समाज के बुजुर्ग व्यक्ति ने तुरंत मंगू के शरीर के बंधन खोल दिए. मंगू उठ कर खडा हो गया. उसके पिताश्री कालिदास खुशी से झूम उठे. वे हर्षित होकर जलाराम बापा के जयकारे लगाने लगे. वहां मौजूद लोग भी भक्ति भाव से "जलाराम बापा की जय" बोलने लगे.
पल भर में शोक का माहौल हर्ष के वातावरण में बदल गया. कालिदास ने जलाराम बापा के चरण स्पर्श करते आभार जताया- "बापा, आप भगवान् के अवतार हैं. आपने मेरी खुशियाँ लौटा दी. मेरे एकलौते सहारे को नया जीवन देकर बड़ा उपकार किया. मैं, मेरा बेटा और पूरा कुटुंब जीवन भर आपका आभारी रहेगा". मंगू ने भी जलाराम बापा के पैर छूकर आभार जताया. जलाराम बापा ने दोनों से कहा- "जीवन की डोर प्रभु के हाथ में रहती है, हम इंसान तो कठपुतली मात्र हैं. उनकी इच्छा ही सर्वोपरि है. इसलिए प्रभु पर सदैव आस्था रखना".
जलाराम बापा से आशीर्वाद लेने के बाद कालिदास ने प्रसन्न होकर सबका मुंह मीठा कराने के उद्देश्य से चचेरे भाई शामजी से कहा- "शामजी भाई, दो चार आदमी को साथ ले जाकर हलवाई के यहाँ जाओ और लगभग पचास लोगों
को पूरा हो उतना हलवा बनवा कर ले आओ". कुछ देर बाद हलवा लाया गया. इसी दौरान आसपास के मोहल्ले में भी मंगू के जीवित होने की चमत्कारिक घटना की जानकारी वायुवेग से फ़ैल चुकी थी. फलस्वरूप करीब पांच सौ लोग हलवा बन कर आते तक इकट्ठे हो गए. यह विकट स्थिति देख कर कालिदास घबरा गए. पचास लोगों के जितना हलवा मंगवाया गया था, जबकि मौजूद थे करीब पांच सौ लोग. हलवा किसे खिलाएं, किसे न खिलाएं. कालिदास की असमंजसता जलाराम बापा से छिपी न रही. उन्होंने कालिदास से कहा- "भाई, इसमें परेशान होने की आवश्यकता नहीं है. जिस गंज में हलवा रखा है, उस पर कपड़ा ढँक कर बाजू में घी का दीपक जला और प्रभु श्रीराम का नाम लेकर सबको हलवा परोसना प्रारम्भ कर. मैं यहीं बैठा हूँ". फिर क्या था. सभी को हलवा परोसा गया. पचास के बजाय करीब पांच सौ लोगों का मुंह मीठा हो गया. यह चमत्कार भी चर्चा का विषय बन गया. फिर
बारी बारी सबने जलाराम बापा के चरण स्पर्श कर उनसे आशीर्वाद लिया और अपने अपने घर की राह पकड़ी. ( जारी )                                            
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बुधवार, 21 दिसंबर 2011

Jalaram bapaa kee jeewan-kathaa ( 25 )

सेवक टीडा भगत को "रोटी में राम" के दर्शन करवाए : जलाराम बापा के यहाँ संत महात्माओं की सेवा करने के उद्देश्य से कुछ सेवक भी रहते थे. इनमें टीडा भगत नामक एक वृद्ध सेवक भी शामिल था. इसका काम था संत महात्माओं सहित आगंतुक अथितियों को पानी पिलाना. उम्र को देखते हुए इसे ज्यादा मेहनत वाला कार्य नहीं सौंपा गया था. एक दिन भरी दोपहरी में जलाराम बापा के यहाँ दो तेजस्वी योगी महाराज पधारे. आते ही उन्होंने स्वल्पाहार करने की इच्छा जाहिर की. स्वल्पाहार के बाद टीडा भगत ने उन्हें ठंडा पानी पिलाया. इसी दौरान वहां जलाराम बापा आ पहुंचे. दोनों योगी महाराज को देख कर जलाराम बापा ने स्मित मुस्कान के साथ प्रणाम किया. उन्होंने भी मुस्कुराते हुए आशीर्वाद दिया और विदा हो गए.
 जलाराम बापा ने वहां खड़े सेवक टीडा भगत से पूछा- "भाई, आपने इन दोनों तेजस्वी महाराज को पहचाना क्या?" सेवक ने प्रतिप्रश्न किया- "नहीं बापा, बिलकुल नहीं पहचाना, कौन थे ये महाराज?" जलाराम बापा ने जवाब दिया- "भाई, वे गोपीचंद और भरथरी थे. वे हमारे इस आश्रम को अपनी चरण धूलि से पवित्र करने आये थे. यह हमारा सौभाग्य है". सेवक ने आश्चर्यचकित होकर कहा- "बापा, सचमुच वे गोपीचंद और भरथरी थे. मुझे विश्वास नहीं हो रहा है". जलाराम बापा ने मुस्कुराते हुए कहा- "भाई, आपको अगर असलियत का पता लगाना है तो उनके पीछे पीछे जाओ. अभी वे अधिक दूर नहीं गए होंगे. आप देखोगे इस तेज धूप में भी उनको छाया देने ऊपर बादल साथ चल रहे होंगे". यह जान कर वह सेवक तत्काल उनके पीछे दौड़ पडा.
थोड़ी ही दूर जाने के बाद सेवक को वे दोनों योगी महाराज भजन गाते हुए जाते दिख गए. जलाराम बापा की बात याद आते ही सेवक ने आकाश की तरफ सर उंचा किया तो देखा वास्तव में भरी दोपहरी में भी बादलों का एक समूह ऊपर छाया बन कर दोनों योगी महाराज के साथ साथ चल रहा है. जबकि आसपास तेज धूप थी. सेवक ने यह अद्भुत नजारा देख कर दांतों तले उंगली दबा ली. वे उन दोनों योगी महाराज की ओर अपलक निहारते रहे. फिर
देखते ही देखते वे दोनों सेवक की नज़रों से ओझल हो गए.
वापस लौटते ही सेवक टीडा भगत ने जलाराम बापा को आँखों देखा हाल बताया. उन्होंने हाथ जोड़ कर जलाराम बापा से शिकायत भरे लहजे में कहा- "बापा, अगर ऐसा था, तो आपने मुझे उनके बारे में पहले क्यों नहीं बताया, मैं उनके चरण में गिर कर उनसे कुछ मांग लेता". जलाराम बापा हँसे और कहा- "अरे भाई, अभी भी कुछ पाना शेष  रह गया है क्या? यहाँ आपको किस चीज की कमी महसूस हो रही है, जो चाहते हैं वह सब तो यहाँ आपको मिल रहा है. इसके पश्चात भी आपको यदि ऐसा लगता है कुछ पाना और शेष रह गया है तो प्रभु श्रीराम का नाम जपते हुए सच्चे मन से अथितियों की सेवा करते रहो, अवश्य ही आपका बेडा पार हो जाएगा". जलाराम बापा के यह वचन सुन कर सेवक के ज्ञान चक्षु खुल गए. उसी पल सेवक ने अपनी समस्त तृष्णाओं को त्याग दिया. भूखे और दुखी जनों में उन्हें दरिद्र नारायण दिखने लगे. उनकी सेवा ही प्रभु की सच्ची भक्ति लगी. उनकी मन से सेवा करते करते
उन्हें यह समझ में आ गया गरीबों को जो तृप्त करता है, उस पर प्रभु की कृपा दृष्टि अवश्य होती है. जलाराम बापा द्वारा दिए गए जीवन मंत्र "भूखे को अन्नदान जैसा श्रेष्ठ दान दूसरा नहीं है" का सही अर्थ अब सेवक को समझ में आने लगा था. जलाराम बापा ने सेवक को भी "रोटी में राम" के दर्शन करवाए. ( जारी )